यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम: पेपर - III (सामान्य अध्ययन-2: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध) - 03, अक्टूबर 2019


यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम (Answer Writing Practice for UPSC IAS & UPPSC/UPPCS Mains Exam)


मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम:

  • प्रश्नपत्र-3: सामान्य अध्ययन-2: (शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध)

प्रश्न - पिछले दिनों चर्चा में रही अफगान- शांतिवार्ता से आप क्या समझते है? अमेरिका के इस शांतिवार्ता से पीछे हटने के कारणों पर चर्चा कीजिए। भारत के लिए इस शांतिवार्ता का क्या महत्व है? (250शब्द)

मॉडल उत्तर:

  • चर्चा में क्यो है
  • अफगान- शांतिवार्ता
  • अमेरिका के इस शांतिवार्ता से पीछे हटने के कारण
  • भारत के लिए इस शांतिवार्ता का क्या महत्व
  • निष्कर्ष

निष्कर्ष

अफगानिस्तान का मामला बहुत पुराना और पेचीदा है। समय की मांग है कि शांति के लिए चर्चा होनी चाहिए। तीन बड़े पक्षकार-अमरीका, तालिबान और अफगान सरकार के लिए जरूरी है कि आपसी विश्वास को बढ़ावा  दे । इसके अलावा अन्य देशों जैसे- चीन, रूस, पाकिस्तान, भारत, तुर्की और सऊदी अरब, को भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

भारत के लिए इस शांतिवार्ता का क्या महत्व

अफगानिस्तान में भारत के हितों को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-

भारत पहले ही अफगानिस्तान में अरबों डॉलर के लागत वाले कई मेगा प्रोजेक्ट्स को पूरा कर चुका है और कुछ पर अभी भी काम चल रहा है। भारत ने अब तक अफगानिस्तान को लगभग तीन अरब डॉलर की सहायता दी है जिसके तहत वहाँ संसद भवन, सड़कों और बांध आदि का निर्माण हुआ है। वहां कई मानवीय व विकासशील परियोजनाओं पर वह अभी भी काम कर रहा है। भारत 116 सामुदायिक विकास परियोजनाओं पर काम कर रहा है जिन्हें अफगानिस्तान के 31 प्रांतों में क्रियान्वित किया जाएगा। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, पेयजल, नवीकरणीय ऊर्जा, खेल अवसंरचना और प्रशासनिक अवसंरचना के क्षेत्र भी शामिल हैं। भारत काबुल के जिये शहतूत बांध और पेयजल परियोजना पर भी काम कर रहा है। अफगानिस्तान के साथ संबंधो को और मजबूत बनाने के लिए भारत ने मार्च 2002 में अफगानिस्तान में अपने दूतावास का विस्तार किया और इसके बाद मजार-ए-शरीफ, हेरात, कंधार और जलालाबाद में भी वाणिज्य दूतावास खोले थे। भारत ने अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप के देशों से व्यापार और संबंधों को मजबूती देने के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट के विकास में भारी निवेश किया है। इससे चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना के काट के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि अफगानिस्तान में तालिबान सत्तासीन होता है तो भारत की यह परियोजना भी खतरे में पड़ सकती है क्योंकि इससे अफगानिस्तान के रास्ते अन्य देशों में भारत की पहुंच बाधित होगी। अमेरिकी सेना का अफगानिस्तान में रहना वहां की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। अगर अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से चली जाती है तो वहां तालिबान का कब्जा हो जाने की आशंका है। ऐसे में भारत द्वारा वित्तपोषित विकास परियोजनाएं रूक सकती हैं। गौरतलब है कि यदि एक स्थिर एवं आर्थिक रूप से संपन्नता की ओर उन्मुख अफगानिस्तान अतीत में भारत के लिए हितकारी था तो यह भविष्य में भी एक प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए।

अमेरिका के इस शांतिवार्ता से पीछे हटने के कारण

अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इस वार्ता को स्थगित करने का तात्कालिक कारण वार्ता से कुछ ही दिन पहले मध्य काबुल में हुए आत्मघाती कार बम विस्फोट को बताया गया। तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी भी ली थी। लेकिन अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि वार्ता भंग करने की असली वजह यह नहीं है जो कि अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा बताई गई है। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन में ही सहमति नहीं थी कि समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं या नहीं। अमेरिका द्वारा तालिबान से शांति वार्ता को समाप्त करने के कारणों को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-

अमरीका ने तालिबान की यह शर्त मान ली थी कि वार्ता में अफगान सरकार को शामिल नहीं करना है। ऐसे में 15 महीने की वार्ता में अमरीका वह हासिल नहीं कर सका, जिसकी उसे उम्मीद थी। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार कुछ और भी कारण बताते हैं। उनका मानना है कि समझौते पर दस्तखत के लिए चुना गया समय भी राजनीतिक दृष्टि से ट्रंप प्रशासन को मुश्किल में डाल सकता था। विश्लेषकों का मानना है कि समझौते की तारीख उसी दिन के आसपास पड़ती जब अमरीका पर 2001 में हुए 9/11 हमलों की बरसी थी। ऐसे में इसी मौके पर तालिबान से बात करना अमेरिका के लिए मुफीद समय नहीं था। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों के अनुसार युद्धविराम अथवा ‘अंतरा-अफगान वार्ता’ में भागीदारी के लिये तालिबान की ओर से कोई गारंटी प्राप्त नहीं हुई थी। ऐसे में संभावना जतायी जा रही थी कि राष्ट्रपति ट्रंप इस समझौते को समाप्त करने के लिये एक विकल्प की तलाश कर रहे हों और इसी क्रम में 5 सितंबर को काबुल में हुए आतंकी हमले से उन्हें समझौता रद्द करने का एक कारण मिल गया ।

चर्चा में क्यो है?

हाल ही में  अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान नेताओं के साथ ‘कैंप डेविड’ में होने वाली गोपनीय बैठक को रद्द कर शांति वार्ता के फिर से शुरू होने की संभावना को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।

अफगान- शांतिवार्ता

जर्मनी और कतर के साझा प्रयास से 7 से 8 जुलाई 2019 को दोहा में दो दिवसीय अंतरा-अफगान संवाद का आयोजन किया गया था। इस संवाद ने अफगानिस्तान में पिछले 18 वर्षों से चले आ रहे रोजाना के खून-खराबे के अब खत्म हो जाने की उम्मीदों को बढ़ा दिया था। अमेरिका, रूस, जर्मनी जैसी बड़ी शक्तियों; और इनके साथ ही अफगानिस्तान के लोग एवं अशरफ गनी सरकार तक ने संवाद को बहुत बड़ी कामयाबी मानते हुए संतोष व्यक्त किया था। इसे व्यापक अर्थ में, तालिबान और अफगानिस्तान सरकार के बीच भविष्य में अधिक से अधिक औपचारिक संवाद कायम होने के एक प्रारम्भिक प्रयास के रूप में देखा जा रहा था। हालांकि इस अंतरा-अफगान संवाद पर करीब से नजर डालने पर अफगानिस्तान में अमन का रास्ता अभी भी बहुत लम्बा और बेहद कठिन मालूम पड़ता है।

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