यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम: पेपर - III (सामान्य अध्ययन-2: शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध) - 11, सितंबर 2019


यूपीएससी आईएएस और यूपीपीएससी मुख्य परीक्षा के लिए उत्तर लेखन अभ्यास कार्यक्रम (Answer Writing Practice for UPSC IAS & UPPSC/UPPCS Mains Exam)


मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम:

  • प्रश्नपत्र-3 सामान्य अध्ययन-2: (शासन व्यवस्था, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध)

प्रश्न - राज्यों में राष्ट्रपति शासन भारतीय संविधान के अन्य प्रावधानों के तहत कार्रवाई की समाप्ति के बाद अंतिम उपाय के रूप में संयम से प्रयोग किया जाना चाहिए। हाल की घटनायें दर्शाती हैं कि राष्ट्रपति शासन का लागू किया जाना भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के संघीय चरित्र को नकारता है और लोकप्रिय संप्रभुता के लोकतांत्रिक सिद्धांत का विरोध करता है। औचित्य सिद्ध कीजिए।

मॉडल उत्तर:

राष्ट्रपति शासन का तात्पर्य है राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 356 में वर्णित है, परन्तु उससे पहले अनुच्छेद 365 के तहत निर्देश अपेक्षित होता है। इसके अनुसार राष्ट्रपति निम्न आधार पर राष्ट्रपति शासन लगा सकता है।

  • राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर कि राज्य शासन संविधान के अनुसार नहीं चल रहा है।
  • स्वतः बिना किसी रिपोर्ट के जब राष्ट्रपति को लगे कि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है।
  • राज्य दिए गए निर्देशों का पालन न करे।

वस्तुतः राष्ट्रपति शासन संघ की शक्तियों का विस्तार है जो उपयुक्त तीनों स्थितियों में होता है भारतीय संविधान संघ पर यह कर्तव्य डालता है कि राज्य को बाहरी एवं आंतरिक अशान्ति से रक्षा करे (अनुच्छेद 355) तथा यह व्यवस्था बनी रहे कि राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार संचालित हो। उसी संदर्भ में राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था की गई है। किंतु संविधान में वर्णित इन आधारों से स्पष्ट है कि राष्ट्रपति शासन का प्रयोग भारतीय संविधान के अन्य प्रावधानों के तहत की गई कारवाई के बाद अंतिम उपाय के रूप में किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए राज्यविधानसभा में किसी भी दल के बहुमत में होने या न होने का निर्धारण विधानसभा में होना चाहिए न कि राज्यपाल के स्वविवेक के आधार पर। इसी प्रकार राज्य में वित्तीय स्थिति की खराबी अथवा मंत्रियों के विरूद्ध भ्रष्टाचार का आरोप राष्ट्रपति शासन लगाने का उचित आधार नहीं है।

सरकारिया आयोग ने सिफारिश की कि अनुच्छेद 356 का अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए जब अनुच्छेद 256, 257 व 355 के तहत कार्यवाहियों के विकल्प समाप्त हो चुके हों। सरकारिया आयोग ने पाया कि अधिकतर स्थितियों में जहाँ अनुच्छेद 356 का प्रयोग किया गया वहाँ अनुच्छेद 355 के माध्यम से स्थिति संभाली जा सकती थी परंतु दुर्भाग्य से अनुच्छेद 355 का प्रयोग कभी नहीं किया गया। सरकारिया आयोग ने कहा कि राजनैतिक अस्थिरता की स्थिति में अनुच्छेद 356 लागू करने से पहले संबंधित राज्य को अपना पक्ष रखने व स्थिति से निपटने का अवसर दिया जाना चाहिए। इसी से संबंधित सरकारिया आयोग ने कुछ अन्य सिफारिशें भी कीं। आयोग ने कहा कि राज्यपाल को नियुक्त करते समय राष्ट्रपति को मुख्यमंत्री से सलाह लेनी चाहिए। उसे राज्य से बाहर का व्यक्ति होना चाहिए। उसे राज्य की राजनीति से नहीं जुड़ा होना चाहिए। उसे राजनीति में अधिक सक्रिय भूमिका वाला व्यक्ति नहीं होना चाहिए विशेषकर हाल के समय में।

हाल के वातावरण में देखते है तो पाते हैं कि राज्यपाल सक्रिय राजनीति में संलग्न कोई व्यक्ति होता है जो संघीय सरकार अपने विवेक से नियुक्त करती है जिसमें मुख्यमंत्री की कोई प्रभावी सलाह नहीं ली जाती। ऐसे में राज्यपाल संघीय एजेण्ट के रूप में कार्य करता है व राजनीति प्रेरित निर्णय लेने से कई बार राज्यों में राजनैतिक अस्थिरता भी फैलती है।

इसके अलावा प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी राज्यपाल गैर-राजनैतिक व्यक्तियों, जिन्हें सार्वजनिक जीवन एवं प्रशासन का लंबा अनुभव हो को नियुक्त करने की सिफारिश की। 1969 में तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित राजमन्नार आयोग ने अनुच्छेद 356, 357 एवं 365 जो राष्ट्रपति शासन से संबंधित है, को हटाने की सिफारिश की। पुंछी आयोग (2007) ने अनुच्छेद 355 एवं 356 के संशोधन की सिफारिश की।

हाल में कुछ घटनाएँ दर्शाती है कि राष्ट्रपति शासन का लागू किया जाना भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के संघीय चरित्र को नकारता है और लोकप्रिय सम्प्रभुता के लोकतांत्रिक सिद्धांत का विरोध करता है। हाल में एक घटना अरूणाचल प्रदेश में देखने को मिली जब राज्यपाल ने अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने के बजाय अपने स्वविवेकाधिकार का मनमाने तरीके से प्रयोग किया। उन्होंने अरूणाचल प्रदेश की तत्कालीन नबाम तुकी सरकार को बहुमत साबित करने का मौका दिए बैगर राजभवन को राजनीति का हिस्सा बनाया। मनमाने तरीके से विधान सभा का सत्र निर्धारित किया तथा उन क्षेत्रें में जाकर स्वविवेक की संभावनाओं को तलाशा जहां संविधान अनुमति नहीं देता। विधानसभा स्पीकर की बर्खास्तगी के मामले में संवैधानिक दिशानिर्देश का उल्लंघन किया। उत्तराखण्ड में भी ऐसी ही स्थितियाँ देखी गईं।

वस्तुतः भारतीय संविधान संघीय व्यवस्था की स्वीकृति प्रदान करता है जिसने केन्द्र एवं राज्य दोनों स्तर पर द्वैध राजपद्धति की व्यवस्था की गई है। दूसरे संघ एवं राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन कर क्षेत्रधिकारों को भी निर्धारित किया गया है। तीसरे संघ एवं राज्य दोनों स्तर पर लोकप्रिय सम्प्रभुता को मान्यतः प्रदान की गई है। दोनों स्तर पर जनता के द्वारा निर्वाचित सरकार है। अतः यदि मनमाने तरीके से राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है तो यह राज्यव्यवस्था के संघीय चरित्र को तो नकारता ही है साथ ही साथ लोकप्रिय सम्प्रभुता के सिद्धांत का भी विरोध करता है। यही कारण है कि उच्चतम न्यायालय ने एस-आर- बोम्मई वाद 1993 में कहा कि अनुच्छेद 356 का प्रयोग करने के पहले राज्यपाल को सभी विकल्पों का तलाश करना आवश्यक है।

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