भारत-जर्मन संबंधों में एक लोकतांत्रिक और सामरिक असंगति - समसामयिकी लेख

की-वर्डस :- विदेश नीति में अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता को आगे बढ़ाने का अधिकार; 3-राष्ट्र यूरोप का दौरा; जर्मनी के इंडो-पैसिफिक दिशानिर्देशों, भू-राजनीतिक और राजनयिक शतरंज की बिसात के अनुसार लोकतांत्रिक गठबंधन बनाना; छठा भारत-जर्मनी अंतर-सरकारी परामर्श (आईजीसी), एक द्विवार्षिक प्रारूप; उभरती बहुध्रुवीयता I

संदर्भ -

  • यूक्रेन में चल रहे युद्ध के कारण, भारतीय प्रधानमंत्री की जर्मनी की हालिया यात्रा एक महत्वपूर्ण समय पर हो रही है।
  • मास्को पर अमेरिका और यूरोपीय देशों के प्रतिबंधों और यूक्रेन को सैन्य सहायता के बावजूद, रूस पर अपने रुख में कोई बदलाव नहीं करने के प्रति भारत मुखर रहा है।
  • उदाहरण के लिए, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में मास्को पर मत देने से परहेज किया है और सस्ते कच्चे तेल के आयात को बढ़ाने के लिए रूस के साथ समझौता किया है। साथ ही, रूस के साथ इसके लंबे समय से चले आ रहे भारत के पारंपरिक रक्षा संबंध बरकरार हैं। हालांकि, भारत ने बार-बार युद्धविराम कर, बातचीत और कूटनीति के माध्यम से विवादों के समाधान का आह्वान किया है।
  • लेकिन, भारत द्वारा इस नाजुक संतुलन को साधने के प्रयास ने पश्चिम देशों की आलोचना को आमंत्रित किया है। हालांकि, नई दिल्ली इस बात पर जोर देती है कि युद्ध पर उसकी स्थिति तटस्थ/गैर-पक्षपाती रही है और उसके सहयोगियों और मित्रों द्वारा इसकी सराहना की जानी चाहिए।

लेख की मुख्य विशेषताएं :-

दृष्टिकोण में सूक्ष्मता लाने के लिए करना होगा प्रयास :-

  • भारत के सामरिक हलकों में यह मान्यता बढ़ती जा रही है कि नई दिल्ली को यूरोप के प्रति अपने दृष्टिकोण में और अधिक सूक्ष्मताएं लानी होंगी।
  • अपने राष्ट्रीय हितों और विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को आगे बढ़ाने के अपने अधिकार पर जोर देते हुए एक नाजुक संतुलन साधने की आवश्यकता है। क्योंकि भारत पश्चिम देशों द्वारा अलग-थलग किये जाने का जोखिम नहीं उठा सकता।
  • इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री का तीन देशों का यूरोप दौरा (डेनमार्क, फ्रांस और जर्मनी) महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • देरी के बावजूद, यूरोपीय राष्ट्र यूक्रेन के खिलाफ रूसी आक्रमण की निंदा करने के लिए एक साथ खड़े हैं। संयुक्त राष्ट्र के वोटों में भारत की अनुपस्थिति और रूस के साथ उसके संबंधों की निरंतरता ने जर्मनी की चिंता बढ़ा दी है।
  • एक प्रमुख शक्ति और सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की भूमिका पर चर्चा हो रही है और यह अपेक्षा बढ़ रही है कि भारत को रूस पर अपना रुख बदलना चाहिए और लोकतंत्र की रक्षा के लिए यूरोपीय देशों और अमेरिका के साथ हाथ मिलाना चाहिए।

जर्मनी के लिए हिन्द-प्रशांत का बढ़ता महत्व :-

  • भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले, जर्मनी के चांसलर एशिया की अपनी पहली यात्रा पर जापान गए थे। यह जर्मनी के हिन्द-प्रशांत नीति के दिशानिर्देशों के अनुसार लोकतांत्रिक गठबंधन बनाने का प्रतीक है।
  • इन दो बैठकों ने जर्मनी के विश्लेषकों के बीच एक लोकतांत्रिक लाभ की उम्मीदें जगाई हैं जिससे दोनों देशों के बीच रूस पर विचारों और संभावित नीतियों का अभिसरण हो सकता है।
  • हालांकि, नई दिल्ली ने जर्मनी, जापान और भारत को परिभाषित करने वाले समान लोकतांत्रिक मूल्यों को आकार देने वाली नीति पर आगे बढ़ाने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने के का विकल्प चुना है।

चीनी फैक्टर :-

  • चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए, भारतीय नीति निर्माताओं ने पड़ोस में लोकतंत्र को बढ़ावा देने के बजाय वास्तविक शक्तियों से निपटने का विकल्प चुना है।
  • अफगानिस्तान का एकमात्र अपवाद, जहां भारत अभी भी तालिबान के साथ व्यापार करने के लिए अनिच्छुक है।
  • म्यांमार की जुंटा सरकार के प्रति भारत की नीति को व्यावहारिक दृष्टिकोण के आलोक में परिभाषित करना चाहिए।
  • इसलिए, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए हितों के अभिसरण का औचित्य भारत और जर्मनी के बीच एक ठोस बंधन नहीं होना चाहिए।
  • विशेष रूप से हिन्द-प्रशांत में, चीन के उदय का मुकाबला करने के लिए भू-राजनीतिक गठबंधन लोकतांत्रिक मानदंडों और मूल्यों की रक्षा के पहलुओं के बजाय एक अधिक अनिवार्य आवश्यकता प्रतीत होती है।

यूरोप के साथ जुड़ाव :-

  • जहां तक सामान्य रूप से यूरोप और विशेष रूप से जर्मनी के साथ भारत के रिश्तों का संबंध है, भारत का उद्देश्य बहुआयामी रहा है।
  • भारत ने तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद, रूस और यूक्रेन पर अपनी स्थिति में संशोधन नहीं किया हैI यद्यपि भारत ने अपनी स्पष्ट नीति के अंतर्गत हिंसा की निंदा को रेखांकित करना जारी रखा है।
  • इस तरह की नीति का उद्देश्य विश्व व्यवस्था में खुद को अलग-थलग नहीं बल्कि एक स्विंग पॉवर के रूप में पेश करना हैI जो भू-राजनीतिक और कूटनीतिक शतरंज की बिसात पर चतुराई से अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति में सक्षम हो।
  • छठे भारत-जर्मनी अंतर-सरकारी परामर्श (आईजीसी) का आयोजन, एक द्विवार्षिक प्रारूप है जिसे भारत जर्मनी के साथ आयोजित करता हैI भारत पारस्परिक लाभार्थी संबंधों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निरंतर दोहराता है।
  • भारत 'जर्मनी के साथ लंबे समय से चले आ रहे वाणिज्यिक संबंधों' को महत्व देता है, जो 'रणनीतिक साझेदारी' का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जिसे दोनों देशों ने 2000 में आरंभ किया था।
  • लोकतांत्रिक और रणनीतिक मुद्दों पर तीव्र असहमति के बावजूद, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर दोनों देश साझा दृष्टिकोण रखते हैं।

संबंधों के विकास के लिए असीम संभावनाएं :-

  • एक दूसरे की सामरिक संस्कृतियों और घरेलू राजनीति की समझ का अभाव, भारत-जर्मनी संबंधों को अपनी पूर्ण क्षमता को हासिल करने की अनुमति नहीं देता है।
  • जर्मनी ने इस साल जून में होने वाली जी-7 बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया है।
  • यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उभरती हुई बहुध्रुवीयता को दर्शाता है।
  • यह प्रमुख शक्तियों (जर्मनी और भारत) को अन्य थिएटरों, विशेष रूप से अफगानिस्तान और हिन्द प्रशांत में शांति और स्थिरता लाने में बड़ी भूमिका निभाने के लिए स्पेस प्रदान करता है।
  • तीव्र गति से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्यों के बीच, भारत और जर्मनी नई विश्व व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण ध्रुव के रूप में उभर सकते हैं।

स्रोत :- हिंदू

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2:
  • द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से जुड़े समझौते और/या भारत के हितों को प्रभावित करने वाले कारक।

मुख्य परीक्षा प्रश्न:

  • भारत-जर्मनी संबंधों में, हालिया घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए, आगे बढ़ने के लिए एक उपयुक्त उपाय सुझाइए।