भारत में पेट्रोलियम तेल के दाम में हो रही वृद्धि और मुद्रास्फीति - समसामयिकी लेख

की-वर्डस :- मात्रात्मक सहजता, काउंटर चक्रीयता, लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण शासन, अमेरिकी कमोडिटी वायदा आधुनिकीकरण अधिनियम, राजकोषीय प्रोत्साहन, वैश्विक वित्तीय संकट, कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता

चर्चा में क्यों?

  • यूक्रेन युद्ध ने वर्तमान तेल के दाम में हो रही वृद्धि को बनाए रखा है और साथ ही खाद्य पदार्थों और अन्य वस्तुओं में मुद्रास्फीति को बढ़ा दिया है।
  • क्या यह संयोजन लगातार भारतीय मुद्रास्फीति में वृद्धि को उत्पन्न करेगा जैसा कि 2010 के दशक में हुआ था?

कच्चे तेल के दाम में वृद्धि और मुद्रास्फीति के विभिन्न चरण:-

  • 1970 के दशक में तेल के दाम में वृद्धि ने उच्च मुद्रास्फीति के एक विश्वव्यापी मुकाबले को ट्रिगर किया था, लेकिन बाद में कीमत में होने वाली वृद्धि,अधिकांश देशों में मुद्रास्फीति के बिना ही नियंत्रित हो गई थी।
  • 70 के दशक के अंत में, 90 के दशक के अंत में और 2002-2005 में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि हुई थी, लेकिन भारत सहित दुनिया ने इसे बेहतर तरीके से प्रबंधित किया था।
  • इनके प्रबंधन में खुलापन, सस्ता आयात, अधिक लचीली मजदूरी और तेल पर कम निर्भरता के साथ-साथ बेहतर मौद्रिक नीति शामिल थे।
  • उस समय उत्पादकता बढ़ रही थी और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियां(जो वर्तमान में हैं) कीमत में हो रही वृद्धि में अनुपस्थित थे।
  • हालांकि 2002 में तेल की कीमतों में वृद्धि के बाद विश्व खाद्य कीमतों में वृद्धि शुरू हो गई थी, भारतीय खाद्य मुद्रास्फीति आंशिक रूप से कम रही थी, क्योंकि इस अवधि में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में केवल मामूली वृद्धि हुई थी। साथ ही खाद्य स्टॉक एक सर्वकालिक निचले स्तर पर गिर गया था।
  • लेकिन 2006-07 से एमएसपी तेजी से बढ़े थे, क्योंकि खरीद कीमतों पर लगाया गया अनुशासन खत्म कर दिया गया था।
  • 2010-11 में खाद्य भंडार और मुद्रास्फीति दोनों चरम पर पहुंच गए थे।
  • तेज नीति के नेतृत्व में मांग संकुचन ने तेल-कीमतों में वृद्धि के लिए उत्पादन वृद्धि को कम कर दिया, साथ ही खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति कम रही इस कारण मुद्रास्फीति को कम करने में सफल रहे थे

तेल की कीमत के झटके और वैश्विक वित्तीय संकट :-

  • भारत में, मुद्रास्फीति की ऐतिहासिक उच्च एकल-अंकीय दर 90 के दशक के अंत में आधी हो गई थी, लेकिन 2008 में दोहरे अंकों में पहुंच गई, जैसे कि 70 के दशक की शुरुआत में तेल के दाम में वृद्धि के दौरान हुई थी।
  • उस तेल की कीमत की वृद्धि के झटकों ने वैश्विक वित्तीय संकट को पूर्वनिर्धारित किया और इसके घटने के बाद, तेल की कीमतें फिर से बढ़ीं और 2014 तक एक उच्चता के साथ नियत रहीं।
  • इस तरह के दाम में वृद्धि क्षेत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला में लागत को बढ़ाते हैं, लेकिन निरंतर मुद्रास्फीति के लिए, मजदूरी को भी बढ़ाना पड़ता है। अधिक संभावना होती है कि इससे खाद्य कीमतें भी देश में बढ़ती हैं।
  • चूंकि उच्च इनपुट मूल्यों ने खाद्य मुद्रास्फीति को बनाए रखा है, जबकि भारत संयोजन का सामना करने में असमर्थ था।
  • भोजन, उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के खपत बास्केट में कम हिस्सा रखता है।
  • प्रशासित घरेलू ईंधन की कीमतें न तो बढ़ीं और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के रूप में गिरी, लेकिन संचयी भारतीय ईंधन मुद्रास्फीति वैश्विक स्तर से बहुत अधिक हो गई।
  • इस शाफ़्ट प्रभाव(ratchet effect) ने भारतीय मुद्रास्फीति में योगदान दिया। यह कम पुरानी मुद्रास्फीति बनाने वाले अन्य लागत-पुश कारकों में से एक था।
  • 2005 से मामूली गिरावट के बाद, धीरे-धीरे कीमतें बाजार चालित हो गईं, परन्तु 2015 में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बड़ी गिरावट के बाद भी भारत में कीमतें अधिक थी क्योंकि भारत में इन पर लगने वाले करों को बढ़ाया गया था।
  • फिर भी, इसने देश के मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने में योगदान दिया।

क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?

  • युद्ध जारी है, लेकिन विकसित होती भारतीय विविधता का मतलब है कि कोई भी चुनौती काउंटर के रूप में भारत के लिए कुछ अवसर पैदा करेगी। सीमा की ऊंची कीमतों (आयत निर्यात शुल्क) से फार्म लॉबी को एमएसपी बढ़ाने में मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए, वर्तमान गेहूं की कीमतों में वृद्धि घरेलू कीमतों में वृद्धि कर रही है, लेकिन यह अस्थायी है।
  • अधिकांश भारतीय कृषि उत्पाद की कीमतें उच्च सीमा तक पहुंच गई हैं या ऊपर हैं, यह एमएसपी में वृद्धि को सीमित करती हैं।
  • कृषि उत्पादकता, विपणन अवसंरचना और समन्वय में सुधार के रूप में निर्यात में वृद्धि हुई है।

आपूर्ति पक्ष क्रियाओं का प्रभाव :-

  • आपूर्ति-पक्ष क्रियाएं लागत-पुश कारकों को कम कर रही हैं।
  • यह एक स्थायी लागत-पुश को एक अस्थायी झटके में परिवर्तित करता है।
  • अमेरिका में, अतिरिक्त राजकोषीय प्रोत्साहन और तंग श्रम बाजारों के कारण कोविड आपूर्ति-पक्ष की बाधाएं स्थायी होती जा रही हैं।
  • इसलिए, भारतीय मुद्रास्फीति अमेरिका से अलग है और इस कारण भारत को इतिहास का पालन करने की आवश्यकता नहीं है।

भारत में मुद्रास्फीति व्यवस्था का पालन किया गया:-

  • भारत अब एक लचीली मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण व्यवस्था के तहत है।
  • ब्याज की वास्तविक दरों को संतुलन के पास रखने के लिए नीतिगत दरों में वृद्धि करनी होगी क्योकि मुद्रास्फीति के सहिष्णुता बैंड से लगातार ऊपर जाने की उम्मीद बताई जा रही है।
  • प्रतिक्रिया का यह आश्वासन मुद्रास्फीति की उम्मीदों को स्थिर करने में मदद करता है।

आपूर्ति में झटके की स्थिति :-

  • आपूर्ति के झटकों के तहत, अवस्फीति से उत्पादन को कम करना पड़ता है।
  • यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि भारत में राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता से कम है और भारत में बेरोजगारी भी अधिक है।

आउटपुट स्तर को कैसे बनाए रखने रखा जाए ?

  • उत्पाद शुल्क करों में एक काउंटर-चक्रीय गति, विशेष रूप से ईंधन पर, यह उत्पादन में होने वाली कमी को कम कर सकता है।
  • यदि करों में वृद्धि केवल तब होती है जब अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें गिरती हैं, जैसा कि 2014 और 2020 में हुआ था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें बढ़ने पर गिरावट नहीं आती है, तो यह पहले के शाफ़्ट को फिर से लागू करेगा, जिससे कास्ट क्रीप(cost creep) की स्थिति होगी और भाररतीय मुद्रास्फीति को अंतरराष्ट्रीय स्तर से अधिक रखने और मुद्रास्फीति की उम्मीदों को स्थिर करना मुश्किल हो जाएगा।
  • विश्व तेल की कीमतें 2021 की शुरुआत में और 2014 के अंत की तुलना में कम थीं। लेकिन भारतीय खुदरा कीमतें अधिक थीं।

कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव :-

  • अमेरिकी कमोडिटी फ्यूचर्स आधुनिकीकरण अधिनियम के बाद अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमतें अत्यधिक अस्थिर रही हैं, जिसने बाजार-व्यापार की स्थिति की सीमा को आसान कर दिया, अन्य विनियमों के बीच, बाजार के उतार-चढ़ाव को बढ़ा दिया
  • ब्रेंट ऑयल 2008 के मध्य में $132 से लेकर तेज उतार-चढ़ाव के साथ जनवरी 2016 में $30 तक, रहा। कोविड के समय यह $ 18 तक के स्तर तक भी गया परन्तु यह लंबे समय तक नहीं रहा।
  • यूक्रेन के बाद, यह फिर से $130 से ऊपर थोड़ा ऊपर उठा। भिन्नता का मासिक गुणांक 2000 से पहले 25 और उसके बाद 42 रहा था।
  • इस तरह की अस्थिरता आयातक और उत्पादक दोनों देशों को आहत करती है और इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाए जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष :-

  • राज्यों के साथ-साथ केंद्र के लिए तेल करों में कुछ काउंटर चक्रीयता पेश करने के लिए एक सूत्र, जो अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थ्रेसहोल्ड से जुड़ा हुआ है, पहले के शाफ़्ट पर वापस जाए बिना अत्यधिक अस्थिरता को कम करेगा जिसने लागत को बढ़ा दिया।
  • यह मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण स्थापित करने, केंद्र और राज्यों के बीच गतिरोध के कारण देरी को कम करने और भारत की जीएसटी प्रणाली में ईंधन को शामिल करने की दिशा में एक कदम होने में मदद करेगा।
  • सरकारों के पास अभी भी इच्छानुसार तेल पर करों को बदलने की शक्ति होगी, लेकिन तेल करों का कुछ हिस्सा स्वचालित रूप से वैश्विक तेल की कीमतों में वृद्धि के साथ गिर जाएगा और इन कीमतों में गिरावट आने पर बढ़ जाएगा। इन बदलावों को केंद्र और राज्यों के बीच बांटा जाएगा।

स्रोत : लाइव मिन्ट

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2:
  • विकसित और विकासशील देशों की नीतियों और राजनीति का भारत के हितों पर प्रभाव।

मुख्य परीक्षा प्रश्न:

  • यूक्रेन युद्ध ने वर्तमान तेल की कीमतों के झटके को बनाए रखा है और साथ ही खाद्य पदार्थों और अन्य वस्तुओं में मुद्रास्फीति को बढ़ा दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट के संभावित प्रभाव की जांच करें।