हिंसा मुक्त विश्व का निर्माण - समसामयिकी लेख

चर्चा में क्यों?

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने लखीमपुर में हुई हिंसा की निंदा करते हुए कहा- हिंसा कहीं भी, किसी भी राज्य में हो वो निंदनीय है I

पृष्ठभूमि

मानव स्वभाव से हिंसक प्राणी हैI समाज मनुष्यों के निरंतर सहयोग एवं संघर्ष द्वारा चालित संस्था है I समाजीकरण की प्रक्रिया द्वारा मनुष्य में अहिंसा के गुण को समाविष्ट किया जाता है I ताकि समाज के अस्तित्व को सुनिश्चित किया जा सके I

संकीर्ण अर्थों में अहिंसा को मन, कर्म, वचन से किसी को भी कष्ट न पहुंचाने से संदर्भित किया जाता है जबकि अहिंसा को व्यापक संदर्भों में सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, दया, सहानुभूति और सेवाभाव रखना शामिल है I इस प्रकार अहिंसा करुणा, दया, धैर्य और शांति जैसे मूल्यों की प्राप्ति में सहायक हैI महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, और महात्मा गांधी द्वारा अहिंसा को व्यापक संदर्भों में शाश्वत जीवन मूल्य के रूप में ग्रहण किया गया है, जो भारतीय समाज की सहज नैतिकता से जुड़ जाता है I शायद इसीलिए इतिहासकारों ने घनानन्द को परास्त कर मौर्य साम्राज्य की नींव स्थापित करने वाला चन्द्रगुप्त को नहीं बल्कि अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले अशोक को महान बताया है I

वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ जैसे मूल्यों के केंद्र में प्राणिमात्र के प्रति करुणा, आत्मीयताबोध शामिल है जो अहिंसा के बिना संभव नहीं थाI

यद्यपि धर्म से जुड़े रूढ़िवादी तत्वों के कारण धार्मिक प्रथाओ के नाम पर बलिप्रथा कुछ समाजों में आज भी लोकप्रिय हैI किन्तु विश्व का लगभग हर धर्म दार्शनिक रूप में प्रेम शान्ति में अभिवृद्धि को बढ़ावा देने के लिए अहिंसा को प्रोत्साहन देता हैंI

गांधी जी के जन्मदिन ‘2 अक्टूबर’ को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाये जाने का निर्णय किया गया है I क्योंकि गांधी जी ने असहमति (विरोध) को भी अहिंसक ढंग से प्रकट करने का तरीका (सत्याग्रह ) विश्व को सीखाया I लोकतंत्रिक देशों में विरोध प्रदर्शन का यह तरीका वैधानिक भी है और प्रभावी भी I

हिंसा- मानवता के लिए अभिशाप

जान हाब्स के अनुसार- मनुष्य मूलत: और अनिवार्यता स्वार्थी प्राणी हैI इसलिए अपने स्वार्थ सिद्ध के लिए मनुष्य दुसरें प्राणियों जीव जन्तुओं यहाँ तक मनुष्यों को क्षति पहुँचाने,हिंसा करने से भी नहीं चूकताI हिंसा से मानव जीवन, सम्पत्ति, संसाधन और पर्यावरण सभी की हानि होती है I असहिष्णुता,प्रतिशोध और शक्ति प्रदर्शन की भावना हिंसा के रूप में प्रकट होती हैI हिंसक समाज में नये विचार नहीं पनपते, समाज पिछड़ा और सांस्कृतिक रूप से विपन्न हो जाता हैI

प्राचीन काल में आदिमानव पशु-पक्षियों की हत्या कर उनसे अपना आहार प्राप्त करता था I धीरे धीरे मनुष्य में पारिवारिक, सामाजिक और सम्पत्ति जैसे आर्थिक मूल्य विकसित हुए I जिससे कबीलाई संस्कृति का विकास हुआ I कबीलाई समाज एक दूसरें से निरंतर संघर्षरत रहते थे I उनके धार्मिक रीति-रिवाजों में पशुबलि, अंग भंग करके अराध्य को समर्पित करना जैसी मान्यताएं प्रचलित थी I हिंसक समाज होने के कारण वीरता को अतिशय महत्व दिया जाता था I

‘राज्य’ नामक संस्था का निर्माण सुरक्षा, सम्पति और शांतिपूर्ण सहस्तित्व के लिए किया गया था I मगर राज्यप्रायोजित हिंसा और राज्य विस्तार ने हिंसा को व्यवस्थित रूप प्रदान कर दिया I मार्क्स और गांधी दोनों ही राज्य को हिंसा का साधन मानते हुए ख़ारिज करते हैं I लेकिन मार्क्स राज्य के अस्तित्व को हिंसा द्वारा जबकि गांधी अध्यात्मिक उन्नयन (अहिंसक मार्ग) के द्वारा राज्य के अस्तित्व को नष्ट करना चाहते थेI

उत्तर वैदिक काल में पशुबलि और हिंसा की बढ़ती प्रवृति के कारण महिलाओं और शूद्रों की सामाजिक स्थिति में गिरावट आई I और ऐसी परम्परायें विकसित हुई जिनमे शूद्रों और महिलाओं का निरंतर शोषण प्रारंभ हुआ I

मध्यकाल में विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत पर आक्रमण किये तो राज विस्तार के लिए भी राजाओं ने निरंतर युद्ध किये I समाज में भी आन्तरिक स्तर पर जाति-धर्म-लैंगिक-क्षेत्रीयता के आधार पर गतिरोध पनपता रहा I

आधुनिक काल की शुरुवात से ही यूरोपीय शक्तियों ने साम्राज्यवादी विस्तार के क्रम में हिंसक साधनों का प्रयोग कर अपनी शक्ति द्वारा एशिया,अफ्रीका, उत्तरीय अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और आस्ट्रेलिया महाद्वीपों में अपना विस्तार किया I स्थानीय जनता के संसाधनों को छीन कर यूरोपीय शक्तियों ने राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की I उपनिवेशों पर अधिकार को लेकर दो-दो विश्वयुद्ध हुए जिनमें अत्याधुनिक परमाणु हथियारों तक का प्रयोग किया गया I

यद्यपि शीतकाल के दौर में (1945 से 1991 तक) शांति स्थापित रही लेकिन असहिष्णुता, अविश्वास और असहमति के कारण हिंसा केन्द्रित दृष्टिकोण विश्व व्यवस्था को आकार देता रहा I

आतंकवाद कायराना हिंसा के एक रूप में उभर कर सामने आया है, जिसमें राज्य प्रायोजित आतंकवाद, आतंकवाद का एक व्यवस्थित रूप हैI हिंसा को लेकर वैश्विक स्वीकृति का ही परिणाम है कि आतंकवाद को भी राष्ट्रीय हितों के अनुरूप “गुड टेरिरिज्म” और “बेड टेरिरिज्म” के रूप में परिभाषित किया जाता है I

अफगानिस्तान की सत्ता पर क़ाबिज तालिबान ने महिलाओं, अल्पसंख्यको के खिलाफ हिंसक कार्यवाहियां तेज कर दी हैंI लेकिन विश्व बिरादरी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप ‘मानवाधिकारों के उल्लंघन पर’ चुप्पी साधे बैठी है I जो हिंसा को वैधता प्रदान करती हैI

हिंसा किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकतीI दीर्घकाल में हिंसा के नकारात्मक प्रभाव ही अधिक परिलक्षित होते हैंI

जैसे जैसे समाज विकसित हो जाता है इसके मूल्य परिष्कृत होते जाते हैं I हिंसा की परिभाषा भी परिष्कृत और व्यापक होती गई है I वर्तमान समय में, दूसरों के विचारों को न सुनना,अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना, असहिष्णुता, दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण इन सारे तथ्यों को ‘हिंसा’ के दायरे में लाया जाता हैI

भारतीय समाज में अहिंसा

अहिंसा भारतीय परंपरा में यह एक व्यक्तिगत नियम है पतंजलि योग सूत्र जिसका पालन एक पूर्ण जीवन जीने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए। अहिंसा को व्यक्तिगत नैतिकता के पहले सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में भी जहां अत्यधिक उग्र संघर्ष चल रहा था, अहिंसा पालन की एक आधारभूत नियम के रूप में प्रशंसा की गई थी।

भारतीय दर्शन में शाकाहार प्रवृत्ति को लेकर मिलती अतिशय स्वीकृति अहिंसा के मूल्य पर विकसित हुई हैI

भारतीय समाज में व्याप्त विविधता के मद्देनज़र विरोधाभासों में समन्वय स्थापित करना महत्वपूर्ण गुण है I इस संदर्भ में ‘अहिंसा’ का महत्व बढ़ जाता हैI

भारत में प्राचीन काल से ही जैन, बौद्ध धर्म में अहिंसा को महत्व दिया गया है, विशेषकर जैन धर्म में I यद्यपि जैन धर्म में अहिंसा को अतिवादी रूप में प्रस्तुत किया गया है जैसे अहिंसा को सभी कर्तव्यों में श्रेष्ठतम माना गया है। अणुव्रत में कहा गया है कि खेती करते समय यदि पूरी सावधानी के बावज़ूद हिंसा हो जाए तो क्षम्य है। जान-बूझकर की गई अहिंसा अक्षम्य है। जरूरत से अधिक धन संचय न करना (अपरिग्रह) भी अहिंसा का ही परिष्कृत स्वरुप हैI

महात्मा बुद्ध का मध्य मार्ग अहिंसा के दर्शन पर ही आधारित है I बौद्ध धर्म में अहिंसा का सामान्य अर्थ है ‘हिंसा न करना’I जिसके अंतर्गत किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म वचन और वाणी से कोई क्षति न पहुंचाना सम्मिलित है I मन से किसी का अहित न सोंचना, कटु वाणी द्वारा किसी को नुकसान न पहुंचाना शामिल है I

गांधी के अनुसार अहिंसा नैतिक जीवन जीने का मूलभूत तरीका है। यह सिर्फ आदर्श नहीं, बल्कि यह मानव जाति का प्राकृतिक नियम है। हिंसा से किसी समस्या का तात्कालिक और एकपक्षीय समाधान हो सकता है, किंतु स्थायी और सर्वस्वीकृत समाधान सिर्फ अहिंसा से ही संभव है। गांधी के अनुसार अहिंसा बहुत ऊँचे नैतिक व आध्यात्मिक बल पर टिकी होती है।

गांधी के अनुसार यदि हिंसा और कायरता में से एक को चुनना हो तो हिंसा को चुनना उचित है I गांधीवादी अहिंसक आन्दोलन में उमड़ते जन सैलाब ने भारतीय समाज में अहिंसा को लेकर स्वीकृति को प्रदर्शित किया I

अहिंसक होने के कारण सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकी I

अहिंसा- ‘राष्ट्रीय चरित्र के रूप में’

समाज विभिन्न वर्गो के प्रति सहयोग एवं संघर्ष द्वारा निर्मित होता हैI व्यक्तियों के मध्य संघर्ष हिंसात्मक रूप न गृहण करें, इसकी चिंता समाज के शिल्पकारों को सदैव रहती हैI इस परिप्रेक्ष्य में सामाजिक सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए अहिंसा सार्वभौमिक और शाश्वत मूल्य बन जाती है I भारतीय समाज में ‘अहिंसा को राष्ट्रीय चरित्र’ बनाने के लिए निम्नलिखित प्रयास किये जा सकते हैं -

भारत में विविधता व्याप्त है, क्षेत्रीयता, अलगाववाद, नक्सलवाद और साम्प्रदायिकता जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए नीति निर्माताओं को ‘अहिंसक मूल्यों’ को बढ़ावा देना चाहिए I राम और कृष्ण के जीवन के मिथकों को आधार बनाकर युवाओं को हिंसा से दूर कर त्याग और सेवा के कार्य में लगाना चाहिए I

राजनीतिक दलों को अपराधियों से दूरी बनानी चाहिए, साफ़ छवि वाले लोगों को राजनीति में लाना चाहिए I इससे राजनीति में शुचिता बढ़ेगी, और जनता का लोकतंत्र में विश्वास बहाल होगा I
‘विधि के शासन’ को सुनिश्चित करते हुए अपराधियों के प्रति त्वरित कार्यवाही होनी चाहिए I हिंसा के किसी भी मामले को राजनीतिक लाभ/हानि की दृष्टि से नहीं बल्कि सामाजिक सद्भाव की दृष्टि से, मानवीय दृष्टि से देखना चाहिए I

‘लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक नैतिकता के आलोक में अहिंसा

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का चरित्र अहिंसक ही था यद्यपि क्रांतिकारी हिंसक घटनाएँ भी हुई किन्तु इन हिंसक घटनाओं का उद्देश्य किसी की जान लेने का नहीं,अपितु सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाना था I यानि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का चरित्र लगभग अहिंसक ही थाI गांधीवादी आंदोलन में उमड़ता जनसैलाब इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैI

‘विधि का शासन’ और ‘विधि के समक्ष समता’ जैसे मूल्यों पर ही अहिंसक समाज पोषित होता है I न्याय पर आधारित समाज ही अहिंसक हो सकता है इसलिए भारतीय संविधान में आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक न्याय के मूल्यों को अपनाया गया हैI साथ ही समानता, स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकार भी व्यक्ति की गरिमा और अहिंसक विरोध प्रदर्शन को स्वीकृति प्रदान करते हैंI दलित/आदिवासी/पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के हितों में विशेष प्रावधान किये गये है जिनसे उनको समान अवसर प्राप्त हो सकें I यह सारे मूल्य अहिंसक समाज के निर्माण की विभीषिका निर्मित करते हैं I

नागरिकों को अधिकार देने के साथ ही मौलिक कर्तव्य के रूप में उनसे कुछ नैतिक अपेक्षाएं भी की गयी हैं I जिसके अंतर्गत व्यक्तियों के मध्य आपसी प्रेम, एकता, भातृत्व की भावना को विकसित करने की संकल्पना शामिल है I

भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 47 के अंतर्गत दुधारू पशुओं की हत्या को प्रतिबंधित करने का प्रावधान है I अनुच्छेद 40 स्थानीय स्वशासन शक्तियों के विकेंद्रीकरण और अनुच्छेद 50 के अंतर्गत कार्यपालिका-न्यायपालिका के मध्य शक्तियों का विभाजन को बढ़ावा देने जैसे सिद्धांत अहिंसा को बढ़ावा देने में सहयोगी हैं I अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि भारत विश्वशान्ति के लिए प्रयास करता रहेगा I

इस प्रकार संवैधानिक नैतिकता अहिंसा को प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है I

आगे की राह-

  1. भारत में विगत कुछ वर्षों में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसक घटनाये देखने को मिली हैं I दिल्ली जैसे राष्ट्रीय राजधानी का घेराव करना सत्याग्रह नहीं हो सकता I क्योंकि सच्चा सत्याग्रही अपनी नैतिकता द्वारा ‘विरोधियों के हृदय परिवर्तन’कराने का प्रयास करता हैंI ऐसे में दबाव समूहों को अपनी नीतिगत खामियों को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए, जैसे- मांगों को टुकड़ो में बांटकर एक एक कर मांग को मनवाते रहना और फिर अन्य मांग पर ध्यान देना चाहिए I जैसे गांधी जी अपने आंदोलनों में करते थे I
  2. कोई भी लोकतंत्रिक सरकार लम्बे समय तक अपने नागरिकों पर लाठी (शक्ति) के सहारे राज नहीं कर सकती, उसे जनता के दिलों पर राज करना होगा I ऐसे में सरकार को अपनी सॉफ्ट पॉवर बढानी होगी, जिसके निर्माण में अहिंसा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है I सरकार नागरिकों के साथ निरंतर संवाद करती रहें I मीडिया जनता और सरकार के मध्य सेतु का कार्य करें I
  3. बढती आर्थिक असमानता, पहचान की राजनीति, क्षेत्रवाद और सम्प्रदायवाद ने समाज को हिंसक प्रवृति की ओर मोड़ा है I नगरों का एकान्तिक जीवन, उपभोगवाद को लेकर बढती स्वीकृति, प्रौद्योगिकी विकास ने मानव को लघु मानव में परिवर्तित कर दिया हैI इस आर्थिक सांस्कृतिक परिवर्तनों ने हिंसक, अनैतिक आचरण को प्रोत्साहन दिया है I ऐसे में भारतीय आध्यात्मिक मूल्य व्यक्तियों को उसके ‘सचिद्धानंद स्वरुप’ ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का बोध करवाकर प्राणियों के प्रति करुणा, प्रेम सेवा और बन्धुत्व की भावना को विकसित कर सकते हैं I
  4. न्याय को सुनिश्चित किये बिना कोई भी समाज अहिंसा की अपेक्षा नहीं कर सकता I अन्याय अन्याय को जन्म देता है I ऐसे में ‘पुलिस सुधार’, न्यायिक प्रक्रिया में तेजी, अपराधियों से मुक्त राजनीति जैसे सुधारों द्वारा न्याय प्रक्रिया में तेजी लाकर अपराधियों को भयाक्रांत और सज्जनों को निर्भय बनाकर अहिंसक समाज का निर्माण किया जाता हैI
  5. अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में ‘वस्तुवाद’ के स्थान पर मानवीय परिप्रेक्ष्य में घटनाओं को देखना चाहिएI और उन समस्याओं का समाधान मानवीय दृष्टिकोण से ही किया जाये ना कि लाभ हानि देखकर I संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को लोकतांत्रीकरण करते हुए सुरक्षा परिषद का विस्तार करना चाहिए I
सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 4
  • नीति शास्त्र