बामियान बुद्ध (Buddha of Bamyan) : डेली करेंट अफेयर्स

मेस अयनाक अफगानिस्तान में एक जगह है। यहां पर भगवान बुद्ध की कई प्राचीन मूर्तियां थी। जब अफगानिस्तान में तालिबान शासन आया तो उसने इन मूर्तियों को बम से उड़ा दिया। हालांकि कुछ ध्वंसावशेष शेष रह गए, जिनको लेकर हाल ही में तालिबान शासन ने कहा कि वह इन प्राचीन बामियान बुद्ध प्रतिमाओं के संरक्षण का काम करेगा।

बामियान अफगानिस्तान के मध्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों में हिंदूकुश के ऊँचे पहाड़ों में स्थित है। यह जिस प्रांत में स्थित है उसका भी नाम बामियान ही है। इसी शहर से होकर एक बामियान नदी भी बहती है। एक वक्त था जब इस नदी के साथ स्थित घाटी से होकर उस समय का सिल्क मार्ग गुजरता था। जब यहां पर कुषाणों का शासन आया तो उस वक्त इस इलाके में बौद्ध धर्म का काफी प्रसार हुआ और साथ ही उसी समय - सिल्क मार्ग होने के नाते - चीन, भारत और रोम के व्यापारी बामियान से होकर गुजरा करते थे तो ऐसे में वहाँ व्यापार ही नहीं बल्कि एक समन्वित संस्कृति का भी विकास होने लगा।

कुषाणों ने यहां पर व्यापारिक गतिविधियों, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं भाषाई विविधता को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्होंने पहली से पांचवी शताब्दी के बीच बामियान में बौद्ध धर्म के प्रसार और कई बौद्ध मठों के निर्माण के लिए काफी काम किया। इस तरह यहां बलुआ पत्थर की चट्टानों से काटकर बनी बामियान बुद्ध की मूर्तियाँ 5वीं शताब्दी की हैं। एक समय था जब यहाँ दुनिया की सबसे ऊँची बुद्ध की खड़ी प्रतिमा मौजूद थी। इनमें सबसे अहम दो प्रतिमाएं थीं। सबसे बड़ी 'सालसाल' 56 मीटर ऊंची थी, जबकि दूसरी प्रतिमा 'शमामा' की ऊंचाई 38 मीटर थी। 'सालसाल' और 'शमामा' वहां के स्थानीय शब्द हैं। 'सालसाल' का मतलब होता है "प्रकाश ब्रह्मांड के माध्यम से चमकता है", जबकि शमामा का अर्थ है "रानी माँ"।

1990 के दशक में जब यहां तालिबान का क़ब्ज़ा हुआ तो उन्होंने इन दोनों विशालकाय बौद्ध प्रतिमाओं को गैर-इस्लामी कहकर बम से उड़ा दिया था। तालिबान के इस कदम की वजह से इसे वैश्विक आक्रोश का सामना करना पड़ा। साल 2003 में यूनेस्को ने बामियान बुद्धों के अवशेषों को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल कर लिया। बाद में तालिबान का नियंत्रण कमजोर हो गया। लेकिन हाल ही में अब जब दोबारा से अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आया है तो अचानक वह इसे संरक्षित करने की बात करने लगा है। 9 मार्च, 2021 को साल्सल की प्रतिमा को 3डी तकनीक के माध्यम से फिर से निर्मित किया गया। अब सवाल उठता है कि अचानक तालिबान इन बौद्ध प्रतिमाओं के संरक्षण की बात क्यों कर रहा है। दरअसल मेस अयनाक जहां कि यह मूर्तियां स्थित है यहां पर भारी मात्रा में तांबे के खनिज उपलब्ध होने के प्रमाण मिले हैं। इसके अलावा, तालिबान भारी आर्थिक समस्या से जूझ रहा है। इसलिए वो इन बौद्ध मूर्तियों के संरक्षण की बात करके चीन को धार्मिक सहिष्णुता का संदेश देना चाहता है। तालिबान को उम्मीद है कि चीनी सरकार यहां पर निवेश करेगी और इन खनिजों के दोहन में उनकी मदद करेगी।

अफगानिस्तान का यह कदम उसके कितना काम आएगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। आपको सलाह दी जाती है कि इस कार्यक्रम के अलावा भी आप इस विषय से संबंधित कुछ बिंदुओं पर स्वयं से काम करें जैसे कि सिल्क मार्ग के बारे में अच्छे से जान लें; बौद्ध धर्म से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को जान लें और बामियान और उसके आसपास के लोकेशन को मैप पर अच्छे से देख लें।