देश का पहला इलेक्ट्रिक हाईवे (Country's First Electric Highway) : डेली करेंट अफेयर्स

देश का पहला इलेक्ट्रिक हाईवे (Country's First Electric Highway)

ट्रेन से यात्रा करते वक्त या वैसे भी आपने ट्रेन के ऊपर एक बिजली की तार ज़रूर देखी होगी। ट्रेन के इंजन से ये तार एक आर्म के जरिए जुड़ा होता है, जिससे पूरी ट्रेन को बिजली मिलती है और इसी के सहारे ट्रेन चलती है। अब अगर मैं आपसे कहूं कि हाईवे पर चलने वाले बस या ट्रक जैसे वाहन भी अब इसी तरह से बिजली के सहारे चलेंगे तो आपको यह जानकर थोड़ा आश्चर्य हो सकता है. लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि देश को जल्द ही पहला इलेक्ट्रिक हाईवे मिल सकता है। दरअसल हाल ही में केंद्रीय सड़क मंत्री नितिन गडकरी ने एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि सरकार दिल्ली से जयपुर के बीच इलेक्ट्रिक हाईवे बनाने की तैयारी कर रही है।

इलेक्ट्रिक हाईवे होता क्या है?

बिल्कुल साधारण शब्दों में समझिये कि एक ऐसा हाईवे जिसपर इलेक्ट्रिक वाहन चलते हों। जिस तरह ट्रेन बिजली के जरिए चलती है ठीक उसी तरह हाइवे पर भी बिजली के तार लगाए जाएंगे। हाइवे पर चलने वाले वाहनों को इन तारों के जरिए बिजली की आपूर्ति की जाएगी। इसे ही ई-हाइवे यानी इलेक्ट्रिक हाइवे कहा जाता है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक, ये ई-हाईवे दिल्ली और जयपुर के बीच बनाया जाएगा। 200 किलोमीटर लंबे इस हाईवे को दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे के साथ ही एक नई लेन पर बनाया जाएगा। गौरतलब है कि पूरी तरह से तैयार होने के बाद यह देश का पहला ई-हाईवे होगा।

इलेक्ट्रिक हाईवे काम कैसे करेगा?

इसके लिए आपको बता दें कि दुनियाभर में तीन अलग-अलग तरह की टेक्नोलॉजी ई-हाईवे के लिए इस्तेमाल की जाती हैं - पेंटोग्राफ मॉडल, कंडक्शन मॉडल और इंडक्शन मॉडल। पेंटोग्राफ मॉडल में सड़क के ऊपर एक तार लगाया जाता है, जिसमें बिजली दौड़ती रहती है। एक पेंटोग्राफ के जरिए इस बिजली को वाहन में सप्लाई किया जाता है। ये इलेक्ट्रिसिटी डायरेक्ट इंजन को पॉवर देती है या वाहन में लगी बैटरी को चार्ज करती है। वर्तमान में, भारतीय ट्रेनों में यही मॉडल इस्तेमाल में लाया जा रहा है. चूँकि भारत सरकार स्वीडन की कंपनियों से बात कर रही है, इसलिए माना जा रहा है कि स्वीडन वाली टेक्नोलॉजी ही भारत में भी लाई जाएगी। बता दें कि स्वीडन में पेंटोग्राफ मॉडल का ही इस्तेमाल किया जाता है.

कंडक्शन मॉडल में सड़क के भीतर ही तार लगा होता है, जिस पर पेंटोग्राफ टकराता हुआ चलता है। इसमें वाहन के पिछले हिस्से में पेंटोग्राफ लगा होता है, जो सड़क पर बिछे बिजली की तार से ऊर्जा प्राप्त करता है। इंडक्शन मॉडल में किसी तरह के तार का इस्तेमाल नहीं होता। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक करंट के जरिए वाहन को बिजली की आपूर्ति की जाती है। इसका इस्तेमाल ज्यादा नहीं होता है।

ई-हाईवे से फायदा क्या होगा?

इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इससे वाहनों की आवाजाही पर आने वाले खर्च में भारी कमी हो सकती है। एक आंकड़े के मुताबिक, ई-हाईवे से लॉजिस्टिक कॉस्ट में 70% की कमी आएगी। मौजूदा वक्त में ट्रांसपोर्टेशन लागत का ज्यादा होना चीजों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की एक बड़ी वजह है। ऐसे में, अगर अगर ट्रांसपोर्टेशन लागत में कमी आएगी, तो चीजें सस्ती हो सकती हैं। इसका दूसरा फायदा यह होगा कि ये पूरी तरह से इको फ्रेंडली होगा। वाहनों को चलाने के लिए इलेक्ट्रिसिटी का इस्तेमाल किया जाएगा, जो पेट्रोल-डीजल के मुकाबले पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होगी।

क्या ई-हाईवे पर कार और जीप जैसे निजी वाहन भी चलाए जा सकेंगे?

यहां आपको बता दें कि स्वीडन और जर्मनी जैसे देशों में इनका इस्तेमाल माल वाहन के लिए ही किया जाता है। निजी वाहन इलेक्ट्रिसिटी से चलती तो हैं, लेकिन वह बैटरी की मदद से चलती हैं। सीधी सप्लाई केवल ट्रक और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए इस्तेमाल हो रहे वाहनों में ही दी जाती है। हां, निजी वाहनों की सुविधा के लिए इस हाईवे पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर चार्जिंग स्टेशन बनाया जाएगा, जहां इन्हें चार्ज किया जा सकेगा।

ई-हाईवे की राह में कुछ चुनौतियां

इसमें सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की है। इलेक्ट्रिक हाईवे को बनाने का खर्च आम रोड के मुकाबले ज्यादा आता है और इसमें समय भी ज्यादा लगता है। दूसरी चुनौती की बात करें तो वर्तमान में, भारत में पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों की संख्या काफी ज्यादा है. ऐसे में इन वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों से रिप्लेस करना एक मुश्किल काम होगा। इसके अलावा, जो तीसरी मुश्किल है वह यह कि इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बैटरी बनाना अपने आप में एक जटिल टास्क है।