वनाधिकार क़ानून 2006 (Forest Rights Act 2006) : डेली करेंट अफेयर्स

वनाधिकार क़ानून 2006 (Forest Rights Act 2006)

हाल ही में जम्मू-कश्मीर सरकार ने वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 को लागू करने का फैसला लिया है। इससे वहां रह रहे आदिवासियों और खानाबदोश समुदायों की हालत बेहतर होने की उम्मीद है।

भारत में, आज़ादी के पहले के शोषणकारी अंग्रेजी क़ानून के कारण आदिवासियों और जंगलवासियों को उनका वाज़िब हक़ नहीं मिल पाया था। दशकों तक उन्हें ज़मीन और अन्य संसाधनों से वंचित रखा गया। इस समस्या को दूर करने के लिए भारत सरकार ने दिसंबर 2006 में वनाधिकार क़ानून पारित किया। यह कानून पारंपरिक जंगलवासियों और समुदायों के अधिकारों को कानूनी मान्यता देता है। इसका आधिकारिक नाम - अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 - है।

अगर आजादी के पहले के वन अधिकार कानून की बात करें तो साल 1864 में भारतीय वन विभाग की स्थापना के साथ ही भारतीय वन अधिनियम, 1865 लाया गया था। इसके ज़रिये अंग्रेजी सरकार ने भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद को और बढ़ावा दिया। जंगलों और वनोपज को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया और दशकों से वहां रहने वाले लोगों को 'अतिक्रमणकारी' करार दे दिया। उसके बाद 1878 का वन अधिनियम और 1894 की वन नीति आई। कुल मिलाकर एक सदी से अधिक समय से भारत के जंगलों की शासन व्यवस्था उन भारतीय वन कानूनों के मुताबिक की जाती रही है जो 1876 से 1927 तक पारित किए गए थे। इन कानूनों का पर्यावरण संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं था। बल्कि सरकार का मक़सद इमारती लकड़ी के इस्तेमाल और प्रबन्धन को अपने हाथ में लेना था। इसके लिए जरूरी था कि सरकार वनों पर अपना अधिकार जमाए और पारम्परिक सामुदायिक वन प्रबन्धन की व्यवस्था को बिगाड़ दे, जो उस समय देश के अधिकतर हिस्सों में चलन में थीं।

आज़ादी के बाद साल 1952 में राष्ट्रीय वन नीति अपनाया गया। बाद में, संयुक्त वन प्रबंधन और सामुदायिक वन प्रबंधन जैसे कार्यक्रम भी लाये गए। साल 1988 में एक नई वन नीति लाई गई, जिसमे पहली बार वनों के आर्थिक महत्व से ज़्यादा इस पर स्थानीय लोगों के अधिकार को तरजीह दी गई। हालाँकि इस नीति को क़ानूनी जामा नहीं पहनाया गया था। इसलिए ये ज़मीनी स्तर उतना प्रभावी नहीं रहा। लेकिन बाद में वनाधिकार क़ानून 2006 इस दिशा में एक अहम् क़दम साबित हुआ। यानी 1927 के क़ानून के ज़रिये जो वनवासियों के साथ जो 'ऐतिहासिक अन्याय' किया गया था, 2006 में उसे सही करने की कोशिश की गई।

इस क़ानून के ज़रिये कौन-कौन से अधिकार दिए गए हैं?

  • मालिकाना हक़- कानून के मुताबिक आदिवासियों या वनवासियों को उस ज़मीन का पट्टा दे दिया जाएगा जिस पर वो खेती कर रहे हैं या लगभग तीन पीढ़ियों या 75 साल से रह रहे हैं।
  • वन उत्पादों के इस्तेमाल का अधिकार - लघु वन उपज, चारागाह, और आने जाने के रास्ते के उपयोग का हक़ होगा।
  • राहत और विकास से जुड़े हक़ - वन्य सुरक्षा को देखते हुए अवैध निकासी या जबरन विस्थापन के मामले में पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं का अधिकार होगा।
  • वन प्रबंधन का अधिकार - जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा का हक़ दिया गया है।

सरकार कानून तो लेकर आई लेकिन यह चुनौतियों से मुक्त नहीं रही. उदाहरण के तौर पर वनाधिकार क़ानून यानी एफआरए के तहत जंगल की ज़मीन पर समुदायों के दावों को दर्ज करने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि क़ानून का मूल मक़सद पूरा होता नहीं दिख रहा है। सामूहिक उद्द्येश्य मसलन स्कूल, चारागाह और आंगनवाड़ी के लिए दावा कौन पेश करे इस पर दुविधा बनी रहती है। आदिवासियों की आड़ में भू-माफिया, लकड़ी माफिया और राजनीतिक रसूख वाले लोग इस क़ानून का बहुत दुरुपयोग कर रहे हैं। एफआरए के बाद भी वन विभाग अंग्रेजों के पुराने कानूनों के नक्शे कदम पर चल रहा है। नए वनाधिकार कानून को लागू करने के बदले वह पुराने कानूनों को ही लागू करके जंगल और जनता पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है।

एक आंकड़े के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में आदिवासियों और खानाबदोश समुदायों की आबादी लगभग 14 लाख है। इतनी बड़ी तादाद में लोगों के कल्याण का सवाल है, ऐसे में ज़रूरी है कि इस क़ानून को इस तरह से लागू किया जाये कि इसका मूल उद्द्येश्य पूरा हो।