कैसे गठित किया जाता है किसी नए राज्य को? : डेली करेंट अफेयर्स

21 जनवरी के दिन इतिहास में कई अहम घटनाएं दर्ज हैं। भारतीय इतिहास में यह दिन इसलिए भी खास है, क्योंकि पूर्वोत्तर भारत के 3 राज्य आज अपना स्थापना दिवस मना रहे हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम 1971 के तहत मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा को 21 जनवरी 1972 को अलग राज्य का दर्जा दिया गया था। इस तरह ‘सेवेन सिस्टर्स’ के तहत आने वाले इन तीनों राज्यों को बने हुए आज पूरे 50 साल हो गए हैं।

मौजूदा वक्त में भारत 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों का एक संघ है। इनमें लेटेस्ट जो राज्य गठित किए गए हैं उनमें तेलंगाना, उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ शामिल हैं। दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव भारत का लेटेस्ट केंद्र शासित प्रदेश है।

 Polity Terms : Daily Current Affairs | Dhyeya IAS® - Best UPSC IAS ...

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के मुताबिक, नए राज्य के गठन की शक्ति संसद को प्राप्त है। नए राज्य के गठन की प्रक्रिया कई चरणों में फॉलो की जाती है जिसमें सबसे पहले संबंधित राज्य विधानसभा में अलग राज्य बनाए जाने संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया जाता है। यह प्रस्ताव केंद्रीय कैबिनेट के समक्ष भेजा जाता है और अगर केंद्रीय कैबिनेट ने इस पर अपनी सहमति दे दी तो इससे जुड़े अहम मसलों पर विचार के लिए एक मंत्रिसमूह का गठन किया जाता है। इसके बाद मंत्रिसमूह की सिफारिश पर केंद्र सरकार इस संबंध में एक विधेयक का मसौदा तैयार करती है। इस मसौदे पर एक बार फिर से कैबिनेट की सहमति ली जाती है। अगर कैबिनेट की सहमति मिल जाती है तो इन सिफारिशों को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति इसे संबंधित राज्य की विधानसभा को भेजता है और एक निश्चित समयावधि में उस राज्य की राय जानना चाहता है। हालांकि, राष्ट्रपति संबंधित राज्य की सिफारिश को मानने के लिए बाध्य नहीं होता है। राज्य की राय आने के बाद अगर केंद्र को लगता है कि मसौदे में कुछ परिवर्तन की जरूरत है तो इसमें फिर से परिवर्तन किया जाता है। इसके बाद गृह मंत्रालय एक नया कैबिनेट नोट तैयार करता है। इस तरह राज्य पुनर्गठन विधेयक को अंतिम रूप से केंद्रीय कैबिनेट की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। कैबिनेट की स्वीकृति के बाद इस विधेयक को संसद में पेश किया जाता है और वहां दोनों सदनों से इसे साधारण बहुमत से पारित कराया जाना होता है। संसद से पारित होने के बाद अंत में इस विधेयक पर राष्ट्रपति की मुहर लगती है और उसके बाद नया राज्य गठित हो जाता है।

देश में अभी भी कई इलाके ऐसे हैं जहां पर नए राज्यों के गठन की मांग हो रही है। इनमें सबसे ज्यादा लोग भाषायी और सांस्कृतिक आधार पर नए राज्यों के गठन की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा, स्थानीय संसाधनों के लिये प्रतियोगिता,
कुछ क्षेत्रों के प्रति सरकार की लापरवाही, संसाधनों का अनुचित आवंटन और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण भी नए राज्यों के गठन की मांग की जा रही है। हालांकि कुछ लोग राजनीतिक फायदे और लामबंदी के लिए भी अलग राज्य के गठन की मांग कर रहे हैं। अगर इस तरह ढेर सारे छोटे-छोटे नए राज्यों को बना दिया जाए तो इसके कुछ नकारात्मक राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं जैसे कि विधायकों का एक छोटा सा समूह भी अपनी इच्छा से सरकार बना या बिगाड़ सकता है। इससे विभिन्न राज्यों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता और अंतर्राज्यीय जल, बिजली और सीमा विवाद बढ़ने की भी संभावना होती है। जिस विकास का हवाला देकर नए राज्य का गठन किया जाता है उसका कोई खास असर व्यवहारिक तौर पर देखने को नहीं मिला है। हां … राजकोषीय खर्चा अलग से बढ़ जाता है।

इसके उपाय के तौर और विशेषज्ञ यहीं सुझाते हैं कि राजनीतिक विचारों, धर्म, जाति, भाषा या बोली के बजाय आर्थिक और सामाजिक व्यवहार्यता को प्राथमिकता दी जानी चाहिये। नए राज्यों के गठन के लिए विकास, विकेंद्रीकरण और शासन जैसी लोकतांत्रिक मूल्यों को तरजीह देना ज्यादा बेहतर है।