दो नए टाइगर रिजर्व को मिली सैद्धांतिक मंजूरी : डेली करेंट अफेयर्स

देश का राष्ट्रीय पशु होने के नाते बाघ भारत के लिए खास अहमियत रखता है। ‘पैन्थेरा टाइग्रीस’ के वैज्ञानिक नाम वाले इस जानवर को बचाने के लिए सरकार की तरफ से तमाम कोशिशें की जा रही हैं। इसी क्रम में हाल ही में बाघ संरक्षण पर चौथा एशिया मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया। ये वैश्विक बाघ रिकवरी कार्यक्रम और बाघ संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धताओं की प्रगति की समीक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। गौरतलब है कि अभी कुछ ही दिन पहले राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की 19वीं बैठक का भी आयोजन किया गया था।

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बाघ संरक्षण पर इस चौथे एशिया मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का आयोजन मलेशिया सरकार और ग्लोबल टाइगर फोरम द्वारा किया गया। सम्मेलन में बोलते हुए पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत जल्द ही इस साल के अंत में रूस के व्लादिवोस्तोक में होने वाले वैश्विक बाघ सम्मेलन के लिए नई दिल्ली घोषणा पत्र को अंतिम रूप दे लेगा। यह घोषणा पत्र टाइगर रेंज देशों को उनके यहां बाघ संरक्षण को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगा।

राष्ट्रीय पशु होने के अलावा बाघ पारिस्थितिकी तंत्र में शीर्ष शिकारी होते हैं। ये पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को विनियमित करने और बनाए रखने में महत्वपूर्ण होता है। इसीलिए इस जीव का संरक्षण करना वनाच्छादित पारिस्थितिक तंत्र की भलाई, साथ ही साथ पानी और जलवायु सुरक्षा की भी गारंटी देता है। भारत में ऊंचे पहाड़ों, मैंग्रोव दलदलों, ऊंचे घास के मैदानों से लेकर सूखे और नम पर्णपाती जंगलों के साथ-साथ सदाबहार वन प्रणालियों की विस्तृत विविधताओं में बाघ रहते हैं। इसके आधार पर बाघ न केवल एक संरक्षण प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप में अधिकांश पारिस्थितिकी तंत्र के लिए छत्र प्रजाति की तरह भी है।

बाघों की घटती तादाद को देखते हुए आइयूसीएन ने अपनी रेड लिस्ट में 1969 में ही बाघ को लुप्तप्राय श्रेणी में शामिल कर लिया था। आइयूसीएन के इस कदम ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी तरफ खींचा और फिर बाघ संरक्षण के लिहाज़ से, साल 2010 में सेंट पिट्सबर्ग में एक 'बाघ समिट' का आयोजन किया गया। इस समिट में, 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। साथ ही, इस सम्मेलन में बाघ की आबादी वाले 13 देशों ने ये वादा किया था कि साल 2022 तक वे बाघों की आबादी दुगुनी कर देंगे। ग़ौरतलब है कि भारत ने अपना यह लक्ष्य 2018 में ही यानी तय वक्त से 4 साल पहले ही प्राप्त कर लिया।

दरअसल बाघों का ज्यादातर पर्यावास वन क्षेत्रों में होता है, लेकिन मौज़ूदा वक़्त में जंगलों की अंधाधुंध कटाई के चलते बाघों के पर्यावास पर काफ़ी बुरा प्रभाव पड़ा है। इसलिए वन क्षेत्रों को बढ़ाना और संरक्षित रखना बाघ संरक्षण के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, शारीरिक अंगों के लिए उनका अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन जैसे दूसरे कारक भी बाघों के लिए मुश्किलों का सबब बने हुए हैं। दुनिया भर में बाघों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें साइबेरियन टाइगर, बंगाल टाइगर, इंडोचाइनीज टाइगर, मलायन टाइगर और सुमात्रन टाइगर काफ़ी ख़ास हैं। ग़ौरतलब है कि बाली टाइगर, कैस्पियन टाइगर, जावन टाइगर जैसी प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी हैं। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार, 2012 से 2021 के दौरान इन 10 सालों में देश में 984 बाघों की मौत हुई।

बाघों के संरक्षण के लिए साल 1973 में केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट टाइगर योजना की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य भारत में उपलब्ध बाघों की संख्या के वैज्ञानिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पारिस्थिक मूल्यों का संरक्षण सुनिश्चित करना है। NTCA की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वर्तमान में देश में 51 टाइगर रिजर्व संचालित हैं और टाइगर रिजर्व नेटवर्क के तहत और क्षेत्रों को लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सरकार तीन नए क्षेत्रों को टाइगर रिजर्व का दर्जा देने की मंजूरी दे चुकी है और दो अन्य के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे चुकी है। जिन तीन क्षेत्रों को टाइगर रिजर्व के तौर पर मंजूरी दी गई है, उनमें कर्नाटक का एमएम हिल्स इलाका, छत्तीसगढ़ का गुरु घासीदास नेशनल पार्क और राजस्थान का रामगढ़ विषधारी इलाका शामिल है। अरुणाचल प्रदेश के दिबांग वन्य जीव अभयारण्य और बिहार के कैमूर अभयारण्य को भी टाइगर रिजर्व का दर्जा देने की सैद्धांतिक मंजूरी दी जा चुकी है। प्रोजेक्ट टाइगर को ज़मीनी स्तर पर लागू करने का काम राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का है। यह प्राधिकरण पर्यावरण मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है। इसकी स्थापना साल 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों में संशोधन करके की गई थी।

बाघों के सीमा पार अवैध व्यापार को रोकने के लिए भारत ने नेपाल, चीन और बांग्लादेश के साथ एक सहमति ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किया है। इसके अलावा, बाघों के बहुतायत वाले देशों ने एक अंतर-सरकारी अंतरराष्ट्रीय निकाय ‘ग्लोबल टाइगर फोरम’ का भी गठन किया है। जिसका उद्देश्य बाघों के संरक्षण के संबंध में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को हल करना है। 1997 में, GTF एक स्वतंत्र संगठन बना और इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। भारत इसका एक संस्थापक सदस्य देश हैं। बहरहाल ये राहत भरी बात है कि 2006 की तुलना में 2018 में बाघों की संख्या दोगुनी हुई है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि अभी भी खतरा टला नहीं है। बाघ की प्रजातियों का कम होना जारी है और बाघों की आबादी का प्रबंधन करना समय की मांग है।