जगन्नाथ मंदिर (Jagannath Temple) : डेली करेंट अफेयर्स

दुनिया भर में मशहूर पुरी का जगन्नाथ मंदिर इन दिनों मंदिर एक्ट में बदलाव को लेकर खबरों में हैं। दरअसल, ओडिशा राज्य मंत्रिमंडल ने पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम-1954 में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस अधिनियम में संसोधन के साथ ही मंदिर प्रशासन को मंदिर संचालन कमेटी के अधीन की जमीन व अन्य अचल संपत्ति को बेचने या फिर लीज पर देने का अधिकार मिल जाएगा। इसके बाद से मंदिर की कई विवादित जमीनों के मालिकाना हक में बदलाव की संभावना है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर इससे पहले क्या नियम थे और क्यों इसमें बदलाव किया जा रहा है और श्री जगन्नाथ मंदिर का क्या इतिहास रहा है?

Amendment to the Jagannath Temple Act

श्री जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा के पुरी में स्थित है। कई ताम्रपत्रों से पता चला है कि इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा किया गया था। मंदिर के बारे में प्रचलित धार्मिक कथाओं में जिक्र है कि भगवान जगन्नाथ के मौजूद होने के कारण यहां यमराज की शक्ति खत्म हो गई थी। इसीलिए इस मंदिर को ‘यमनिका तीर्थ’ भी कहा जाता है। इसे मंदिर को "सफेद पैगोडा" भी कहा जाता था और यह चारधाम तीर्थयात्रा यानी बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम में से एक है। मंदिर के चारों दिशाओं में नक्काशी किए गए चार भव्य द्वार बने हुए हैं और इसके प्रवेश द्वार के सामने अरुण स्तंभ जिसे सूर्य स्तंभ भी कहते हैं स्थित है।

कलिंग वास्तु शैली में बना यह मंदिर वैष्णव परम्पराओं और सन्त रामानन्द से जुड़ा हुआ है। यह गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के लिये खास महत्व रखता है। इस पन्थ के संस्थापक श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की ओर आकर्षित हुए थे और कई वर्षों तक पुरी में रहे भी थे। मंदिर में दैनिक तौर पर काफी भव्य पूजा-अर्चना होती है। कई वार्षिक त्यौहार भी आयोजित होते हैं, जिनमें भारी तादाद में लोग भाग लेते हैं। इनमें सर्वाधिक महत्व का त्यौहार है, रथ यात्रा, जो आषाढ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को यानि लगभग जून या जुलाई महीने में आयोजित होता है। इसमें मन्दिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा को अति भव्य और विशाल रथों में विराजमान करके यात्रा पर निकाला जाता है। यह यात्रा 5 किलोमीटर लम्बी होती है, जिसमें लाखों लोग शरीक होते हैं।

अब हुआ यूं कि साल 1806 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने मंदिर के प्रबंधन के लिये कुछ नियम जारी किये। इन नियमों के तहत, मंदिर में आने वाले तीर्थयात्रियों से कुछ टैक्स वसूला जाता था। मंदिर में वरिष्ठ पुजारियों की नियुक्ति का काम ब्रिटिश सरकार करती थी। तीन साल बाद साल 1809 में मंदिर के प्रबंधन की शक्तियाँ खुरदा के राजा को सौंप दी गईं थी, हालांकि ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बना हुआ था। आजादी के बाद जगन्नाथ मंदिर अधिनियम, 1952 पेश किया गया जो 1954 में लागू हुआ। इस कानून में मंदिर के भूमि अधिकार, पुजारियों के कर्त्तव्य, श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति की शक्तियों और प्रशासन से जुड़े कई प्रावधान बनाए गए। इस कानून की धारा 16 (2) में कहा गया है कि मंदिर समिति के कब्ज़े वाली कोई भी अचल संपत्ति राज्य सरकार की पूर्व मंज़ूरी के बिना पट्टे पर, गिरवी, बेची या हस्तांतरित नहीं की जाएगी। इसकी वजह से मंदिर की संपत्तियों को लेकर कई तरह के विवाद पैदा हो गए। इसी समस्या को दूर करने के लिए अब मौजूदा संशोधन को मंजूरी दी गई है। संशोधन होने के बाद जगन्नाथ मंदिर के नाम पर ज़मीन बेचने और पट्टे पर देने की शक्ति अब मंदिर प्रशासन तथा संबंधित अधिकारियों को सौंपी जाएगी।