जयंती विशेष: जोतीराव गोविंदराव फुले (Jyotirao Phule) : डेली करेंट अफेयर्स

जाति, वर्ण, लिंग और परंपरा के आधार पर सामाजिक भेद-भाव की तल्ख सच्चाई से हम इंकार नहीं कर सकते और ये भेदभाव इंसानी सभ्यता और उसकी पूरी विकास यात्रा पर सवाल उठाती रही है। ये सवाल मानवीय अस्मिता के लिहाज से तो अहम हैं ही, इसके लिए होने वाले संघर्ष को जानने-समझने के लिए भी जरूरी है। अलबत्ता इस असमानता के खिलाफ संघर्ष भी काफी पहले शुरू हो गया था और भारत में इस संघर्ष के एक बड़े नायक थे ज्योतिबा फुले।

महात्मा ज्योतिबा फुले, अग्रणी पंक्ति के समाज सुधारकों के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने अपना जीवन निम्न जाति, महिलाओं और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। एक समाज सुधारक होने के साथ-साथ ज्योतिबा फुले लेखक, दार्शनिक और संपादक के रूप में भी उतने ही ख्यातिलब्ध थे। इनका जन्म 11 अप्रैल, 1827 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंदराव फुले और माता का नाम चिमणा बाई था। इनका विवाह सावित्रीबाई फुले के साथ हुआ था।

तात्कालिक समाज में सामाजिक भेदभाव अपने चरम पर था, इसीलिए ज्योतिबा ने दलितों के उत्थान और उन्हें सामाजिक बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए काम करना शुरू किया। उन्होंने दलितों और महिलाओं के अंधविश्वासों के कारण उत्पन्न उनकी सामाजिक और आर्थिक विकलांगता को भी दूर करने की कोशिश की। उनका मानना था कि अगर आजादी, समानता, मानवता, आर्थिक न्याय, शोषणरहित मूल्यों और भाईचारे पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है तो असमान और शोषक समाज की मानसिकता को बदलना होगा।

उनके इस सामाजिक आंदोलन में ज्योतिबा फुले की पत्नी सावित्रीबाई फुले ने भी बराबर की भूमिका निभाई। हालाँकि वो वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन ज्योतिराव ने स्वयं उनकी शिक्षा का प्रबंध करवाया। इसके बाद उन्होंने भारत में लड़कियों के लिए समर्पित पहला विद्यालय खोला। इसके साथ ही उन्होंने कई विद्यालयों की स्थापना की और इनका दरवाजा निम्न जाति की लड़कियों के लिए भी खोल दिया गया। विधवाओं की नीच दशा को देखते हुए उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रम का निर्माण करवाया और साथ ही विधवा पुनर्विवाह की व्यवस्था भी करवाई। कन्याओं की हत्या रोकने के लिए उन्होंने नवजात शिशु के लिए एक बाल आश्रम भी बनाया।

सामाजिक उत्थान की दिशा में काम करते हुए ज्योतिबा ने 24 सितंबर, 1873 को अपने अनुयायियों के साथ 'सत्यशोधक समाज' नामक एक संस्था की स्थापना की थी। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति शूद्रों को उच्च जातियों के शोषण से मुक्त कराना था और उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा दिलाना था। ज्योतिबा ने वेदों को ईश्वर रचित और पवित्र मानने से इंकार कर दिया और तर्क दिया कि यदि ईश्वर एक है और उसी ने सब मनुष्यों को बनाया है तो उसने केवल संस्कृत भाषा में ही वेदों की रचना क्यों की? उन्होंने वेदों को ब्राह्मणों का स्वार्थ साधने वाली पुस्तक बताया। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया और समाज में प्रचलित चतुर्वर्ण जाति व्यवस्था को मानने से इंकार कर दिया।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने न केवल सामाजिक विभाजन और स्त्री की दशा को सुधारने के लिए काम किया, बल्कि उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखी। उनकी पुस्तकों में 'तृतीय रत्न', 'ब्रह्माणंचे कसाब', 'इशारा', 'पोवाडा−छत्रपति शिवाजी भोंसले यांचा', अस्पृश्यांची कैफि़यत' इत्यादि प्रमुख हैं। ज्योतिबा फुले की सबसे चर्चित पुस्तक गुलामगिरी है, जो 1873 ई. में प्रकाशित हुई थी।

भारतीय सामाजिक पुनर्जागरण को नई दिशा देने वाले इस महापुरुष का 28 नवंबर, 1890 को निधन हो गया। डा. भीमराव अंबेडकर महात्मा ज्योतिराव फुले के विचारों से काफी प्रभावित थे।