जयंती विशेष : खुदीराम बोस (Khudiram Bose) : डेली करेंट अफेयर्स

बात फरवरी 1906 की है। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में एक औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी। प्रदर्शनी देखने के लिये आसपास के प्रान्तों से सैंकडों लोग आए हुए थे। वहीं पर एक किशोर बंगाल के एक क्रान्तिकारी सत्येन्द्रनाथ द्वारा लिखे ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पत्रक की प्रतियाँ बांट रहा था। सरकार विरोधी होने के कारण अंग्रेजों द्वारा इस पत्रक पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। ऐसे में जब एक पुलिस वाले ने इस किशोर को इस पत्रक की प्रतियां बांटते हुए देखा तो वो उसे पकडने के लिये दौड़ा। उस किशोर ने इस सिपाही के मुँह पर घूँसा मारा और बाकी पत्रक बगल में दबाकर भाग निकला। बाद में, उस किशोर को गिरफ्तार करके उस पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, लेकिन गवाही न मिलने के कारण वह निर्दोष छूट गया। यह हिम्मती लड़का कोई और नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस थे।

खुदीराम का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बचपन से ही खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की ऐसी ललक जग गई थी। इसी लगन के कारण उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। उनके ऊपर श्री अरबिंदो और भगिनी निवेदिता के भाषणों का काफी असर पड़ा। इसी से प्रभावित होकर उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। साल 1905 में जब ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन की घोषणा की तो तो खुदीराम ने इसका पुरजोर विरोध किया। 15 साल की उम्र में बोस अनुशीलन समिति से जुड़ गए। बता दें कि अनुशीलन समिति ने 20वीं शताब्दी में बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों को काफी बढ़ावा दिया था।

बोस के जीवन में सबसे निर्णायक पल साल 1908 में उस वक्त आया, जब उन्हें मुज़फ्फरपुर के क्रूर ज़िला मजिस्ट्रेट, किंग्सफोर्ड की हत्या का काम सौंपा गया। इस काम में उनके साथ उनके साथ ही प्रफुल्ल चाकी भी शामिल थे। गौरतलब है कि मुजफ्फरपुर ट्रांसफर होने से पहले किंग्सफोर्ड बंगाल के ज़िला मजिस्ट्रेट थे। किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियों और आम नागरिकों पर अपने क्रूर अत्याचार के लिए बदनाम था। इसी के चलते कई युवा क्रांतिकारी उससे बदला लेना चाहते थे। खैर …. खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी ने किंग्सफोर्ड की हत्या की कई कोशिश की। इसी क्रम में इन दोनों क्रांतिकारियों ने 30 अप्रैल, 1908 को किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका। लेकिन उस वक्त उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड मौजूद नहीं था और उसकी जगह गाड़ी में मौजूद दो यूरोपियन महिलाएं मारी गईं। दोनों क्रांतिकारियों को इस बात का काफी पछतावा हुआ। इस घटना के बाद खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर लिया गया और अदालत ने उन्हें फाँसी की सज़ा सुनाई। फैसला देने के बाद जज ने खुदीराम से पूछा, ‘क्या तुम इस फैसले का मतलब समझ गए हो?’ इस पर खुदीराम ने जवाब दिया, ‘हां, मैं समझ गया, मेरे वकील कहते हैं कि मैं बम बनाने के लिए बहुत छोटा हूं। अगर आप मुझे मौका दें तो मैं आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूं।’ 11 अगस्त, 1908 को मात्र 18 साल की उम्र में हाथ में भगवद गीता लिए हुए हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर चढ़कर खुदीराम ने इतिहास रच दिया। इस घटना के बाद किंग्जफोर्ड ने घबराकर नौकरी छोड दी और इसके कुछ ही दिनों बाद डर के मारे उसकी मौत भी हो गई।