भौगोलिक शब्दावली (Geography Terminology) : डेली करेंट अफेयर्स

भौगोलिक शब्दावली (Geography Terminology)

एल नीनो

एल नीनो एक गर्म समुद्री जलधारा है जिसकी उत्पत्ति प्रतिकूल पर्यावरणीय दिशा में सामान्यतः 6 से 7 वर्षों के अन्तराल पर प्रशान्त महासागर के पूर्वी भाग में पेरू के तट के समीप होती है।

इस जलधारा के प्रभाव से जल की सतह के तापमान में वृद्धि से निम्न वायुदाब का विकास हो जाता है। इसी निम्न वायुदाब के केन्द्र से गर्म होकर ऊपर उठने वाली वायु का इंडोनेशिया के समीप अवरोहण होने के कारण उच्च वायुदाब का विकास हो जाता है जिससे वॉकर कोशिका में वायु की दिशा उल्टी हो जाती है, ऐसी स्थिति में पेरू के तट के समीप निम्न वायुदाब का विकास होने के कारण जहाँ औसत से अधिक वर्षा होने पर बाढ़ से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न होती है, वहीं इंडोनेशिया के समीप उच्च वायुदाब का विकास होने के कारण वर्षा के लिये प्रतिकूल स्थिति बनी रहती है, जिससे सूखा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

प्रशांत महासागर के जलीय सतह का तापमान अधिक होने के कारण दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवन की तीव्रता में कमी आती है जिससे भारत की मानसूनी जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

चूंकि एल नीनो जलधारा की उत्पत्ति, नवम्बर, दिसम्बर के समय होती है और दूसरा प्रभाव अपनी चरम सीमा पर जनवरी फरवरी में होता है। इसलिए जिस वर्ष एल नीनो जलधारा की उत्पत्ति होती है, उस वर्ष आने वाले ग्रीष्म ऋतु के समय वाकर-कोशिका काक अन्य समय की अपेक्षा अधिक विकास हो जाता है। जिससे प्रशांत महासागर के पूर्वी भाग की गर्म जलधारा सक्रिय होकर हिन्द महासागर में प्रवेश कर जाती है। इस जलधारा के प्रभाव से ग्रीष्म ऋतु के समय हिन्द महासागर में उच्च वायुदाब की जगह निम्न वायुदाब का विकास होने के कारण मानसूनी पवन के द्वारा होने वाली वर्षा की मात्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

इस प्रकार एल-नीनो जलधारा के प्रभाव से केवल प्रशांत महासागर के तटीय देशों में ही नहीं बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के मानसूनी जलवायु प्रदेश के मौसम पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

वर्तमान समय में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से एल-नीनो जलधारा की उत्पत्ति के समयांतराल में भी कमी आ रही है। यदि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम नहीं किया गया तो आने वाले समय में एल-नीनो जलधारा की उत्पत्ति एक सामान्य घटना हो सकती है। जिससे व्यापक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव देखने को मिल सकते है।

ला नीनोः

स्पेनिश भाषा में ला-नीनो का अर्थ होता है ‘छोटी लड़की’ पूर्वी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में जल का तापमान सामान्य की तुलना में कम हो जाता है तो इसे ला नीना प्रभाव कहा जाता है। ला नीना के परिणामस्वरूप पूर्वी विषुवतीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में एक उच्च दाब की स्थिति उत्पन्न होती है।

ला नीना स्थितियां:

उष्ण कटिबंधीय प्रशांत (कर्क रेखा एवं मकर रेखा के मध्य प्रशांत महासागर क्षेत्र में सामान्य से ठण्डे जल के कारण होती है। इससे पश्चिमी प्रशांत महासागर क्षेत्र में सामान्य से कम वायु दाब का क्षेत्र उत्पन्न होता है। यह निम्न वायुदाब का क्षेत्र वर्षा वृद्धि में योगदान देता है।

प्रभावः

दक्षिण अमेरिकी देशोंः पेरू एवं इक्वाडोर में ला नीनो सूखे का कारण बनती है। जिससे पश्चिमी एवं दक्षिणी अमेरिका के मत्स्य उद्योग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

पश्चिमी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ला नीना भू-स्खलन की संभावना में वृद्धि करता है विशेष रूप से महाद्वीपीय एश्यिा व चीन में।

ला नीना वर्ष के दौरान दक्षिण पूर्व एश्यिा में ‘विशेषकर उत्तर पश्चिम भारत एवं बांग्लादेश में ग्रीष्म मानसून से संबंधित वर्षा सामान्य से अधिक होती है। जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये लाभदायक होती है जो कि कृषि एवं उद्योग के लिये मानसून पर निर्भर होती है।

ला नीना वर्ष में भारत में सामान्य से अधिक सर्दी पड़ती है। क्योंकि साइबेरिया एवं दक्षिण चीन से आने वाली ठण्डी हवाओं के माध्यम से ला नीना भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित करता है।

गल्फस्ट्रीम (खाड़ी की धारा):

उत्तरी अटलांटिक महासागर में प्रवाहित होने वाली गर्म पानी की एक प्रमुख महासागरीय धारा है। यह धारा 20 डिग्री उत्तरी अक्षांश के पास मैक्सिकों की खाड़ी से उत्पन्न होकर उत्तर पूर्वी दिशा की ओर 70 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक पश्चिमी यूरोप के पश्चिमी तट तक प्रवाहित होती है। मेक्सिको की खाड़ी में उत्पन्न होने के कारण इसे खाड़ी की धारा (गल्फस्ट्रीम) के नाम से जाना जाता है।

उत्पत्तिः कैरेबियन सागर में एक एवं युकाटन जलडमरूमध्य के संकरे क्षेत्र से जल की विशाल धारा मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है, पुनः तटीय भागों के स्वरूप के अनुकूल यह दाहिनी तरफ मुड़कर फ्रलोरिडा जलडमरूमध्य से निकलकर खुले समुद्र में प्रवेश करती है। इस भाग में इसे फ्रलोरिडा जलधारा के नाम से जानते हैं।

फ्रलोरिडा जलडमरूमध्य से अटलांटिक महासागर में यह जलधारा औसतन 26 लाख घन मीटर/सेकेण्ड वार्षिक जलराशि लाती है तथा 9 1/2 किलोमीटर/घण्टे की दर से प्रवाहित होती है।

इस भाग में महाद्वीपीय स्तर कम गहरे होने के कारण यह धारा कम गहरी है, परन्तु सारगैसो सागर के पश्चिम में एंटलीज धारा, फ्रलोरिडा जल धारा में 12 लाख घन मीटर/सेकेण्ड की दर से जल को लाकर आपस में मिल जाती है तो इससे गल्फस्ट्रीम धारा की उत्पत्ति होती है।

गल्फस्ट्रीम की विशेषतायें -

यह पश्चिमी तीव्र धारा है जो काफी हद तक हवा के तनाव से संचालित है।

यह गर्म जलधारा अटलांटिक के पार उत्तर-पूर्व में यात्र कर उत्तरी-यूरोप को गर्मी प्रदान करता है।

गर्म जलधारा होने के कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को निर्माण में सहायक है।

गल्फस्ट्रीम का वैश्विक मौसम पैटर्न पर प्रभावः

यह शक्तिशाली महासागरीय धारा है जो स्थानीय तूफानी हवा प्रणालियों को प्रभावित करती है। उष्णकटिबंधीय तूफानों के निर्माण की दशाओं और तीव्रता को प्रभावित करती है।

यह फ्रलोरिडा के पूर्वी तट की जलवायु को प्रभावित करता है। सर्दियों के दौरान बाकी दक्षिण पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में तापमान अधिक गर्म रहता है।

पश्चिमी यूरोप में यह गर्म जलधारा (मुख्यतः ब्रिटेन आयरलैण्ड में) सुखद जलवायु का निर्माण करती है। शीत ऋतु में वहाँ का तापमान बढ़ा देती है।

विषुवत रेखीय धारा (Equatorial Current):

विषुवत रेखा के उत्तर और दक्षिण में पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली दो धाराये- उत्तर विषुवतीय रेखीय धारा तथा दक्षिणी विषुवतीय रेखीय धारा कहलाती है।

ये धारायें उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवन और दक्षिण पूर्वी व्यापारिक पवन से अपनी शक्ति प्राप्त करती है।

प्रति विषुवतीय रेखिक धारा (Equatorial Counter Current):

पृथ्वी के परिभ्रमण द्वारा उत्पन्न विचलन के कारण यह धारायें पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। पश्चिमी की ओर प्रवाहित होती दोनों धाराओं के बीच एक धारा पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होती है जिसे प्रतिविषुवतीय रेखिक धारा कहते हैं।

उत्तरी और दक्षिणीय विषुवत रेखीय धारायें ब्राजील के पूर्वी तट पर जल का ढ़ेर इकट्ठा कर देती है। चूंकि विषुवतीय रेखीय क्षेत्र में विषुवत रेखा के सहारे व्यापारिक पवने कमजोर हो जाती है इस संचित हुये जल का कुछ भाग पूर्व की ओर वापस प्रवाहित होता है जिससे यह ‘प्रति विषुवत रेखिक धारा’ बनती है।

दक्षिणी विषुवत रेखीय धारा की उत्पत्ति अफ्रीका के पश्चिमी तट से होती है जहां से यह दक्षिणी अमेरिका की ओर चलती है। उत्तरी विषुवत रेखीय धारा की अपेक्षा यह धारा अधिक शक्तिशाली, सुस्थिर एवं अधिक क्षेत्र को घेरने वाली है। यह गर्म धारा ब्राजील के तट से टकराकर दो भागों में विभक्त हो जाती है। इसकी उत्तरी शाखा त्रिनिदाद के समीप उत्तरी विषुवत धारा से मिल जाती है जबकि दूसरी शाखा ब्राजील के पूर्वी तट के साथ प्रवाहित होती है इसे ब्राजील की धारा कहते है।

विषुवत धाराओं का संयोजन भौगोलिक विषुवत रेखा से कुछ अंश उत्तर की ओर है जो मौसम वैज्ञानी विषुवत रेखा कहलाती है (मौसम विज्ञानी विषुवत रेखा- वो काल्पनिक रेखा जो विश्व के समान गर्म गोलार्द्ध में विभाजित करती है।)

मौसम विज्ञानी विषुवत रेखा एवं अन्तः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आईटीसीजेड) (जहां व्यापारिक हवायें अभिसरित होती है वो बैंड) 50-80 उत्तर की ओर दर्शाये होते है जिसका कारण विशाल उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में (उत्तरी गोलार्द्ध) ताप का संचयन होता है। वायुमण्डलीय संचरण की भांति सागरीय संचरण भी मौसम विज्ञानी विषुवत रेखा के समीप संतुलन बनाये रखता है।

प्रति विषुवती रेखिक धारा 100 से 150 मीटर गहराई में अटलांटिक, हिंद और प्रशांति महासागर में, पश्चिम से पूर्व 3-100 उत्तरी अक्षांश में प्रवाहित होती है।