हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की भाषा (Language of High Court and Supreme Court) : डेली करेंट अफेयर्स

न्यायपालिका को हमारे संविधान का संरक्षक कहा जाता है। अगर हमारे अधिकारों का उल्लंघन होता है तो हम सबसे पहले न्यायपालिका की ही शरण में जाते हैं। मान लीजिए अगर आप अपनी कोई फरियाद लेकर हाईकोर्ट जाते हैं और कोर्ट आपसे यह कहे कि हाईकोर्ट की भाषा अंग्रेजी है और यहां कोई पक्षकार किसी अन्य भाषा में संबोधित नहीं कर सकता। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर किस कानून के तहत हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में केवल अंग्रेजी में ही अपनी बात रखी जा सकती है और किसी भी कोर्ट की कार्य व्यवस्था को स्थानीय भाषा में करने में क्या दिक्कतें हैं? इसके अलावा, अगर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्य व्यवस्था स्थानीय भाषा में भी होती है तो इसके क्या फायदे होंगे?

Maratha Quota Law Unconstitutional - Supreme Court : Daily Current ...

दरअसल हाल ही में गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ में एक पत्रकार के ऊपर अदालत की अवमानना का मुकदमा चल रहा था। मामले की सुनवाई के दौरान गुजरात हाईकोर्ट ने उस पत्रकार को केवल अंग्रेजी में बोलने के लिए कहा, क्योंकि उच्च न्यायपालिका में इसी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा, मार्च 2021 में पेशे से वकील रह चुके राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी हाईकोर्ट में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की अपील की थी। न्यायपालिका की कार्यव्यवस्था को करीब से देख चुके देश के राष्ट्रपति जब इस बात का जिक्र करते हैं तो इस मुद्दे पर चर्चा करना जरूरी हो जाता है। ये मुद्दा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि शिक्षा का माध्यम और अदालती कार्यवाही की भाषाओं का भी आपस में संबंध है, जिसे समझने की ज़रूरत है।

सबसे पहले आपको बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 348(1) के मुताबिक जब तक संसद किसी अन्य व्यवस्था को न अपनाए, तब तक सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही केवल अंग्रेजी भाषा में होगी। यह संविधान में लिखा है। इसके अलावा, अनुच्छेद 348(2) के मुताबिक किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की अनुमति से हिंदी या दूसरी भाषा को हाई कोर्ट की कार्यवाही की भाषा का दर्जा दे सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि जबतक संसद इस बारे में कोई नया कानून नहीं बनाती, तब तक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की भाषा अंग्रेजी ही बनी रहेगी। न्यायपालिका की भाषा को बदलने का अधिकार खुद अदालतों को नहीं, बल्कि विधायिका और कार्यपालिका के पास है।

यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि आखिर अदालतों की भाषा अंग्रेजी हुई कैसी। दरअसल देश में जब जिस तरह की सत्ता रही उसी हिसाब से अदालतों की भाषा भी बदलती गई। अंग्रेजी शासन से पहले फारसी या उर्दू अदालत की भाषा हुआ करती थी, क्योंकि देश का शासन इन्हीं ज़ुबानों का इस्तेमाल करने वाले राजतंत्र के हाथ में था। जब देश की सत्ता अंग्रेजों के हाथ गई, तब कोर्ट की भाषा अंग्रेजी हो गई। यानी अदालतों में अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल होने को एक तरह का औपनिवेशिक संस्कार कहना गलत नहीं होगा। लेकिन जब अंग्रेज यहां से चले गए और देश आजाद हो गया तब भी हमने अदालतों में स्थानीय भाषा को स्वीकार क्यों नहीं किया। इसके लिए हमें इस राह में आने वाली समस्याओं को समझना होगा। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए कि हाईकोर्ट में स्थानीय भाषा में जिरह को मंजूरी मिल गई। अब मान लीजिए केरल हाईकोर्ट में एक मामले को लेकर मलयालम में बहस चल रही है। अगर दोनों पक्ष मलयालम समझते हैं तब तो कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन अगर दोनों पक्षों में से कोई एक वकील या कोई एक पक्ष गुजरात, बिहार या हरियाणा का हुआ तो अदालत की सारी जिरह उसके सर के ऊपर से गुजर जाएगी। इसके अलावा, अगर किसी वकील या जज ने अपनी पूरी पढ़ाई अंग्रेजी में की है, तो उसके लिए किसी भी राज्य की स्थानीय भाषा में जिरह करना या अपने दस्तावेज़ तैयार करना टेढ़ी खीर साबित होगी। ऐसे में, आखिर इसका उपाय क्या होगा? इसके लिए विशेषज्ञ सुझाते हैं कि पांचवीं तक या उसके बाद भी मातृभाषा में पढ़ाई के फॉर्मूले को लागू करना होगा और शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजी के साथ-साथ स्थानीय भाषा में भी बढ़ावा देने की जरूरत है। नई शिक्षा नीति में सिफारिश भी की गई थी कि 5वीं क्लास तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का मीडियम बनाया जाए। इस तरह जब ऐसे छात्र कोर्ट में वकील या जज बनकर जाएंगे तो वे अंग्रेजी और स्थानीय भाषा दोनों को समझ पाएंगे। इसके अलावा साल 2019 में कोर्ट ने एक पहल शुरू की है जिसके तहत अदालत के आदेशों को स्थानीय भाषा में भी अनुवादित किया जा रहा है। हालांकि रोजाना इतनी मात्रा में कोर्ट के फैसले आते हैं जिससे अनुवाद का यह काम काफी भारी लगने लगता है। साथ ही, कुछ दूसरी तरह की भी समस्याएं हैं जैसे कि पंजाब और हरियाणा दोनों के लिए एक ही हाईकोर्ट है ऐसे में वहां पर किस भाषा में कार्य व्यवस्था होनी चाहिए। इस तरह इसके लिए और भी व्यवहारिक उपाय खोजे जाने की जरूरत है।