ओजोन परत (Ozone Layer) : डेली करेंट अफेयर्स

ओजोन परत (Ozone Layer)

हम अपने शरीर को अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने के लिए सनस्क्रीन लगाते हैं। ठीक उसी तरह पृथ्वी को भी घातक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने का काम पृथ्वी के ऊपर बनी एक ओजोन परत करती है। 'ओजोन' (O3) आक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली एक रंगहीन गैस है, जिसका नियंत्रित मात्रा में पृथ्वी पर होना मददगार साबित होता है। ओजोन परत को ग्रीनहाउस गैसों खासकर क्लोरो फ्लोरोकार्बन से काफी नुकसान पहुंच रहा है. यह ओजोन परत का क्षरण करके पृथ्वीवासियों के लिए खतरा पैदा कर रही है। लॉकडाउन के चलते पिछले साल ओजोन छिद्र भरता दिखाई दिया था, जाहिर है यह पूरी दुनिया के लिए किसी खुशखबरी से कम नहीं था। हालांकि, अभी हाल ही में पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्द्ध से एक थोड़ी चिंताजनक खबर आई है.

दरअसल कॉपरनिकस वायुमंडल निगरानी सेवा, यूरोपियन यूनियन की एक संस्था है जो जो वायुमंडलीय संयोजन के बारे में सतत आंकड़े उपलब्ध कराता है. हाल ही में इसने बताया कि दक्षिणी ध्रुव के ऊपर हर साल बनने वाला ओजोन परत का छेद इस साल सबसे बड़ा है। आमतौर पर दक्षिणी गोलार्द्ध में हर साल अगस्त से अक्टूबर के दौरान बनने वाला यह छेद सितंबर में काफी बड़ा हो जाता है यानी अपने चरम पर पहुंच जाता है। लेकिन इस बार ओजोन परत में छेद इतना बड़ा है कि इसने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। वैज्ञानिकों के मुताबिक, पिछले हफ्ते लगातार बढ़ने के बाद अब ओजोन परत का यह छेद 1979 के बाद से उभरे 75 फीसदी ओजोन छेदों से बड़ा है। फिलहाल इसका क्षेत्रफल अंटार्कटिक से भी ज्यादा हो गया है।

यहां आपके मन में एक सवाल उठ रहा होगा कि आखिर हर साल अंटार्कटिक पर ओजोन परत में छेद क्यों होता है. दरअसल ओजोन परत पृथ्वी से करीब 15-35 किमी ऊपर मौजूद है और यह धरती को सूरज से निकलने वाली घातक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाती है। दक्षिणी गोलार्द्ध के ऊपर होने वाला यह छेद खासकर क्लोरीन और ब्रोमीन जैसे केमिकल्स की वजह से होता है. सर्दियों के दौरान यह केमिकल्स ऊपर समताप मंडल यानी स्ट्रैटोस्फियर तक पहुंच जाते हैं।

जिसकी वजह से अंटार्कटिक में सर्दियों के दौरान ओजोन परत का नष्ट होना जारी रहता है। कुछ जगहों पर कुल ओजोन में दो तिहाई की कमी हो जाती है। इस गंभीर कमी के कारण ओजोन छेद बनता है।

बात भारत की करें तो ओजोन परत के संरक्षण के लिए भारत ने साल 1991 में वियना कन्वेंशन और 1992 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया था। भारत 1993 से ओजोन विघटनकारी पदार्थों को धीरे-धीरे बाहर करने में लगा हुआ है।

इस काम में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानि यूएनडीपी ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बता दें कि बीते 16 सितंबर को दुनिया भर में विश्व ओजोन दिवस मनाया गया। कुल मिलाकर ओजोन परत की संरक्षण के लिए सरकारी जो कोशिश कर रही हैं, उनमें जनभागीदारी भी काफी जरूरी है. भौतिक सुख-सुविधाओ में कमी की बेहतर नीति अपनाकर, ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण करके और दैनिक जीवन में इको फ्रेंडली आदतें अपनाकर काफी हद तक ओजोन परत को संरक्षित किया जा सकता है।