जयंती विशेष: देश की पहली फेमिनिस्ट पंडिता रमाबाई (India's First Feminist Pandita Ramabai) : डेली करेंट अफेयर्स

भारतीय इतिहास में 1850 से लेकर 1900 तक का वक्त सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का काल माना जाता है। इस समय कई मनीषियों ने तात्कालिक भारत में फैली धार्मिक और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अपनी प्रखर आवाज बुलंद की। इस काल से संबंधित ऐसी ही मनीषियों में से एक थीं पंडिता रमाबाई, जिन्हें प्रायः भारत की पहली नारीवादी कहा जाता है।

पंडिता रमाबाई का जन्म 23 अप्रैल 1858 में महाराष्ट्र में हुआ था। इनके पिता का नाम अनंत शास्त्री डोंगरे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। रमाबाई के बचपन का नाम रमा डोंगरे था। केशव चंद्र सेन ने इनके ज्ञान से प्रभावित होकर इन्हें पंडिता की उपाधि प्रदान की थी। एक बार महाराष्ट्र में एक भीषण अकाल पड़ा जिसकी वजह से रमा के माता-पिता और छोटी बहन का देहांत हो गया। इसके बाद वह अपने भाई के साथ कोलकाता चली आईं। यहां इनके ज्ञान की ख्याति काफी फैल गई, जिसकी वजह से कोलकाता विश्वविद्यालय ने उन्हें पंडिता और सरस्वती की उपाधि प्रदान की।

आगे चलकर पंडिता रमाबाई ने रूढ़िवादिता पर प्रहार करते हुए एक कायस्थ वकील विपिन बिहारी मेधावी से शादी कर ली। कुछ दिनों बाद इनके पति की मृत्यु हो गई। जिसके बाद इन्होंने अपना जीवन महिला शिक्षा, बाल विवाह एवं विधवाओं के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। पंडिता रमाबाई ने पुणे में आर्य महिला समाज की स्थापना की एवं मिशनरी गतिविधियों में शामिल हो गई। इन्होंने तात्कालिक पुरुषवादी एवं ब्राह्मणवादी समाज के परंपराओं एवं मान्यताओं पर तर्कों के साथ आलोचना करना प्रारंभ किया और महिलाओं की निम्न स्थिति पर सवाल उठाना शुरू किया।

साल 1882 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में आधुनिक शिक्षा के लिए एक कमीशन गठित की जिसमें पंडिता रमाबाई ने सक्रिय भूमिका निभाई और अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में उन्होंने महिला शिक्षकों, महिला डाक्टरों और महिला इंजीनियरों की आवश्यकता पर बल दिया। ब्रिटिश सरकार ने इनके सिफारिशों को स्वीकार करते हुए इन्हें ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि से सम्मानित किया। अपने ब्रिटेन प्रवास के दौरान पंडिता रमाबाई ने ‘द हाई कास्ट हिंदू विमेन’ पुस्तक को लिखा जिसमें उन्होंने एक हिंदू महिला होने के दुष्परिणामों की विस्तार से चर्चा की।

1886 में पंडिता रमाबाई अमेरिका पहुंची। गौरतलब है कि जब स्वामी विवेकानंद शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में अपना व्याख्यान दिया तब वहां पर रमाबाई की अगुवाई में कई महिलाएं उनके खिलाफ प्रदर्शन करते हुए यह सवाल उठाया कि यदि हिंदू धर्म इतना महान ही है तो वहां पर महिलाओं की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है? इसके साथ ही स्वामी विवेकानंद के भाषण में महिलाओं की अनदेखी पर भी पंडिता रमाबाई के द्वारा उठाए गए। बता दें कि स्वामी विवेकानंद और पंडिता रमाबाई के बीच कई बिंदुओं पर मतभेद थे। हालांकि दोनों तात्कालिक मुद्दों पर अपने विचारों को लेकर बिल्कुल स्पष्ट थे। जहां स्वामी विवेकानंद धर्म की तार्किक व्याख्या कर रहे थे, तो वहीँ पंडिता रमाबाई महिला अधिकारों की वकालत कर रही थी।

पंडिता रमाबाई के प्रयासों के फलस्वरूप अमेरिका में ‘रमाबाई एसोसिएशन’ की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य भारत में चल रहे विधवा आश्रम के लिए संसाधनों को इकट्ठा करना था। बाद में उन्होंने भारत लौटकर विधवाओं हेतु समर्पित ‘शारदा सदन’ की स्थापना की। इसके साथ ही उन्होंने महिलाओं को सहारा देने हेतु ‘कृपा सदन’ नाम के एक महिला आश्रम की स्थापना की। जीवन भर महिला अधिकारों एवं भारत के सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध प्रखर आवाज उठाने वाली इस महान महिला की 5 अप्रैल, 1922 को मृत्यु हो गई।

इनके जीवन के संघर्ष को देखते हुए शुक्र ग्रह के एक क्रेटर का का नाम रमाबाई मेधावी रखा गया। इसी के साथ यूरोपियन चर्च द्वारा 5 अप्रैल को उनकी याद में फीस्ट डे मनाया जाता है। भारत सरकार द्वारा 1989 में रमाबाई की स्मृति में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था।