जयंती विशेष : नेता जी सुभाष चंद्र बोस (Subhas Chandra Bose) : डेली करेंट अफेयर्स

बात अगर आजादी की लड़ाई की हो और सुभाष चंद्र बोस का जिक्र ना हो ... ऐसा हो ही नहीं सकता। अंगेजों की गुलामी की बेड़ियों मे जकड़ी भारत मां के एक सच्चे और वीर सपूत के तौर पर नेताजी का नाम सबसे पहले लिया जाता है। आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती है। इस मौके पर सरकार ने घोषणा की है कि इस दिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाएगा और नई दिल्ली में इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की जाएगी। इतना ही नहीं, इस साल गणतंत्र दिवस समारोह भी 24 जनवरी के बजाय 23 जनवरी से शुरू हो जाएगा।

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। कटक के प्रोटेस्टेण्ट यूरोपियन स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर 1909 में उन्होंने रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया। कॉलेज के प्रिन्सिपल बेनीमाधव दास के व्यक्तित्व का सुभाष के मन पर अच्छा प्रभाव पड़ा। बाद में, कुछ दिक्कतों के चलते इस कॉलेज को छोड़कर उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश ले लिया और फोर्ट विलियम सेनालय में रँगरूट के रूप में प्रवेश पा गये। 15 सितम्बर 1919 को वे इंग्लैण्ड चले गये। वहां पर उन्हें किट्स विलियम हाल में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान की ट्राइपास (ऑनर्स) की परीक्षा का अध्ययन करने हेतु प्रवेश मिल गया। 1920 में उन्होंने आईसीएस परीक्षा की वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त करते हुए इसे पास किया। नेताजी के दिलो-दिमाग पर स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द घोष के आदर्शों ने गहरा प्रभाव डाला था, ऐसे में आईसीएस बनकर वह अंग्रेजों की गुलामी नहीं कर पाए और 22 अप्रैल 1921 को इन्होंने त्यागपत्र दे दिया।

भारत वापस आने के बाद रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह पर वे सबसे पहले मुम्बई गये और महात्मा गांधी से मिले। वहाँ 20 जुलाई 1921 को गाँधी जी और सुभाष के बीच पहली मुलाकात हुई। नेताजी की पॉलिटिक्स और विचारधारा के दो खास दौर थे। 1920-30 के दौरान कांग्रेस का समाजवाद की तरफ झुकाव होने लगा जिसमें नेताजी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। लेकिन 1938 के दौरान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति कई बड़े बदलाव हुए। इसी दौरान द्वितीय विश्वयुद्ध का आगाज़ हुआ और भारत के सामने प्राथमिकता का धर्मसंकट हो गया कि राष्ट्रीय या फिर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों में किसे प्राथमिकता दिया जाय। इन परिस्थितियों में स्वतन्त्रता आंदोलन में तीन प्रकार के सोच उभरकर सामने आए। कम्युनिस्ट फासीवाद की लड़ाई में अंग्रेज़ों के खिलाफ कुछ नरमी बरतना चाहते थे, जबकि सुभाष चाहते थे कि विश्वयुद्ध का फायदा उठाया जाए और अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ाई और तेज़ कर दी जानी चाहिए। इसी को लेकर गांधी जी से उनके मतभेद हो गए। ऐसा कहा जाता है कि भगत सिंह की फाँसी माफ कराने के लिये सुभाष चाहते थे कि इस विषय पर गाँधीजी अंग्रेज सरकार के साथ किया गया समझौता तोड़ दें, और भगत सिंह की माफ़ी के लिए कोशिश करें। लेकिन गांधीजी अपनी ओर से दिया गया वचन तोड़ने को राजी नहीं थे। अंग्रेज सरकार अपने स्थान पर अड़ी रही और भगत सिंह व उनके साथियों को फाँसी दे दी गयी। भगत सिंह को न बचा पाने पर सुभाष गाँधी और कांग्रेस के तरीकों से बहुत नाराज हो गये थे। वे दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने, लेकिन मतभेद के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ दिया और फिर साल 1942 से उन्होंने अपने मुताबिक स्वाधीनता की लड़ाई शुरू की।

परिस्थितिगत वैचारिक अंतराल होने के बावजूद गांधीजी एवं सुभाष दोनों एक दूसरे का बहुत इज्जत करते थे। दोनों ही महापुरुषों का लक्ष्य एक था, लेकिन रास्ते अलग-अलग थे।