टारबॉल्स (Tarball) : डेली करेंट अफेयर्स

टारबॉल्स (Tarball)

समुन्दर के किनारे यानि बीच पर घूमना एक अलग ही तरह का आनंद होता है। ताड़ के पेड़ों से लुका-छिपी करती ढ़लते सूरज की किरणें रेत को चूमती हुई नज़र आती हैं। इसे देखकर आपके अंदर खुद-ब-खुद नयापन और ताजगी आ जाती है। इसके अलावा, आराम से समुंद्र किनारे सनबाथ या फिर किसी मनोरंजक खेल का मजा - इन सबकी बात ही कुछ और है। लेकिन अगर बीच पर काले, चिपचिपे और बेहद ही गंदे बॉल्स फैले हुए हों .... जो कदम रखते ही आपके पैरों में चिपक जाएं और बड़ी ही मशक्कत से छुड़ाए जा सकें, तो फिर पूरा मजा ही किरकिरा हो जाता है। गोवा और मुंबई के खूबसूरत समुद्रतट आजकल इसी परेशानी से जूझ रहे हैं। इस परेशानी का नाम है टारबॉल्स। टारबॉल्स गहरे काले रंग की गेंदे होती हैं, जिनका निर्माण समुद्री वातावरण में कच्चे तेल के अपक्षय यानि (Weathering) की वजह से होता है। चारकोल की ये गेंदे समुद्री लहरों के ज़रिए तटों तक आ जाती जाती हैं। आमतौर पर इनका आकार सिक्कों जैसा होता है, लेकिन कभी-कभी इनकी साइज बास्केटबॉल जैसी बड़ी भी पाई जाती है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियनोलॉजी के मुताबिक़, ये टारबॉल्स या तो समंदर में पहले से मौजूद कच्चे तेल या किसी प्राकृतिक रिसाव की वजह से बन रहे हैं। दरअसल हवा और लहरें पानी में मौजूद तेल को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ देती हैं। लगातार ऐसा होने से तेल का रूप बदल जाता है और ये छोटे-छोटे टुकड़े आपस में मिल कर टारबॉल बन जाते हैं। तेल के कुंए का फटना, दुर्घटनावश या जानबूझ कर जहाजों, छोटी नदियों, नगरपालिका सीवेज और उद्योगों से निकले कचरे को समंदर में बहाने से भी टारबॉल्स का निर्माण होता है। एक खास बात और है कि टारबॉल ज़्यादातर मानसून के सीज़न में ही दिखाई देते हैं। इसके बारे में मरीन एक्सपर्ट्स का कहना है कि मानसूनी हवाओं के सहारे गहरे समुद्र में बने टारबॉल्स किनारे पर आ जाते हैं. आपको बता दें कि ये टारबॉल्स हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर्स में भी पाए जाते हैं। गंगा के मैदानी भागों में बॉयोमास या जीवाश्म ईंधन के जलाए जाने से प्रकाश अवशोषित करने वाले ये टारबॉल्स निकलते हैं जो कि जमी हुई बर्फ पर बैठ जाते हैं।

बात इसके नुकसान की करें तो सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि एक बार चिपकने के बाद इसे कई बार धोकर ही शरीर से साफ किया जा सकता है. ये मछुहारों के जाल में फंस कर उनकी परेशानी बढ़ा सकता है. इसके अलावा, समुद्री पारिस्थितिक तंत्र पर इसका असर पड़ सकता है. उदाहरण के तौर केकड़े और सीप जैसे समुद्री जीव इसे खा जाते हैं जिससे उनका जीवन संकट में पड़ जाता है।

संबंधित राज्य सरकारों द्वारा समुद्र तटों की सफाई कराई जा रही है। लेकिन हर आती लहर अपने साथ टारबॉल ला रही है। ऐसे में ये काफी मशक्कत भरा काम साबित हो रहा है।