बाघ संरक्षण (Tiger Conservation) : डेली करेंट अफेयर्स

देश का राष्ट्रीय पशु होने के नाते बाघ भारत के लिए खास अहमियत रखता है। ‘पैन्थेरा टाइग्रीस’ के वैज्ञानिक नाम वाले इस जानवर को बचाने के लिए सरकार की तरफ से तमाम कोशिशें की जा रही हैं। इसी क्रम में हाल ही में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की 19वीं बैठक का आयोजन किया गया। इस मौके पर केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने कहा कि बाघ अभयारण्य सिर्फ बाघों के लिए ही जरूरी नहीं है बल्कि ये इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन क्षेत्रों से ही जल सुरक्षा के लिए निर्णायक 35 से अधिक नदियां निकलती हैं।

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बाघों की घटती तादाद को देखते हुए आइयूसीएन ने अपनी रेड लिस्ट में 1969 में ही बाघ को लुप्तप्राय श्रेणी में शामिल कर लिया था। आइयूसीएन के इस कदम ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी तरफ खींचा और फिर बाघ संरक्षण के लिहाज़ से, साल 2010 में सेंट पिट्सबर्ग में एक 'बाघ समिट' का आयोजन किया गया। इस समिट में, 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। साथ ही, इस सम्मेलन में बाघ की आबादी वाले 13 देशों ने ये वादा किया था कि साल 2022 तक वे बाघों की आबादी दुगुनी कर देंगे। ग़ौरतलब है कि भारत ने अपना यह लक्ष्य 2018 में ही यानी तय वक्त से 4 साल पहले ही प्राप्त कर लिया।

दरअसल बाघों का ज्यादातर पर्यावास वन क्षेत्रों में होता है, लेकिन मौज़ूदा वक़्त में जंगलों की अंधाधुंध कटाई के चलते बाघों के पर्यावास पर काफ़ी बुरा प्रभाव पड़ा है। इसलिए वन क्षेत्रों को बढ़ाना और संरक्षित रखना बाघ संरक्षण के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, शारीरिक अंगों के लिए उनका अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन जैसे दूसरे कारक भी बाघों के लिए मुश्किलों का सबब बने हुए हैं। दुनिया भर में बाघों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें साइबेरियन टाइगर, बंगाल टाइगर, इंडोचाइनीज टाइगर, मलायन टाइगर और सुमात्रन टाइगर काफ़ी ख़ास हैं। ग़ौरतलब है कि बाली टाइगर, कैस्पियन टाइगर, जावन टाइगर जैसी प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी हैं। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के अनुसार, 2012 से 2021 के दौरान इन 10 सालों में देश में 984 बाघों की मौत हुई।

बाघों के संरक्षण के लिए साल 1973 में केंद्र सरकार ने प्रोजेक्ट टाइगर योजना की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य भारत में उपलब्ध बाघों की संख्या के वैज्ञानिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पारिस्थिक मूल्यों का संरक्षण सुनिश्चित करना है। इसके तहत अब तक देश के 18 राज्यों में 53 टाइगर रिजर्व संचालित हैं और टाइगर रिजर्व नेटवर्क के तहत और क्षेत्रों को लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

प्रोजेक्ट टाइगर को ज़मीनी स्तर पर लागू करने का काम राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का है। यह प्राधिकरण पर्यावरण मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है। इसकी स्थापना साल 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों में संशोधन करके की गई थी।

बाघों के सीमा पार अवैध व्यापार को रोकने के लिए भारत ने नेपाल, चीन और बांग्लादेश के साथ एक सहमति ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किया है। इसके अलावा, बाघों के बहुतायत वाले देशों ने एक ग्लोबल टाइगर फोरम का भी गठन किया है। जिसका उद्देश्य बाघों के संरक्षण के संबंध में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को हल करना है। बहरहाल ये राहत भरी बात है कि 2006 की तुलना में 2018 में बाघों की संख्या दोगुनी हुई है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि अभी भी खतरा टला नहीं है। बाघ की प्रजातियों का कम होना जारी है और बाघों की आबादी का प्रबंधन करना समय की मांग है।