टोंगा में समुद्र के भीतर ज्वालामुखी विस्फ़ोट (Undersea volcano eruption in Tonga) : डेली करेंट अफेयर्स

The Hunga-Tonga-Hunga-Ha'apai volcano जो टोंगा के Fonuafo'ou island के दक्षिणपूर्व में करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है , वहां Underwater volcanic eruption हुआ है जिससे वहां सुनामी की 2 मीटर ऊंची लहरे उठीं और विनाशक तबाही को अंजाम दिया। इंटरनेट सिस्टम पर इससे गंभीर प्रभाव पड़ा है।

प्रशांत महासागर के ऊपर राख, भाप और गैस की मोटी परत दिख रही थी। विस्फोट की आवाज अलास्का जितनी दूर तक सुनी जा सकती थी। ज्वालामुखी विस्फोट के बाद समुद्र में उठी भीषण लहरों ने न्यूजीलैंड और सांताक्रूज, कैलिफोर्निया तक नावों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन कोई व्यापक क्षति नहीं हुई। अमेरिका और जापान में सुनामी का अलर्ट जारी कर दिया गया है । इस जल प्रलय से बचने के सभी प्रयास किये जा रहे हैं।

1991 के फिलीपींस के mount Pinatubo में आये ज्वालामुखी विस्फोट के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा और गंभीर ज्वालामुखी विस्फोट माना जा रहा है।

न्यूजीलैंड कल टोंगा के ऊपर निगरानी उड़ान भेजने में असमर्थ रहा क्योंकि राख का बादल 63,000 फुट (19,000 मीटर) तक छाया हुआ था। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जहाजों और विमानों के जरिए जरूरी सामान पहुंचाने की व्यवस्था करने की दिशा में लगे हैं।

भीषण ज्‍वालामुखी विस्‍फोट से वहां भूकंप और सुनामी आई थी। सुनामी की लहरों का असर अमेरिका और लैट‍िन अमेरिकी देश पेरू तक देखा गया है। टोंगा में सुनामी के कारण इंटरनेट बंद है और पीने का पानी खराब हो गया है। एक मानवतावादी संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

दरअसल, समुद्र के अंदर पड़ी केबल्स के जरिए ही पूरी दुनिया में इंटरनेट चलता है और उन्हीं के जरिए कम्युनिकेशन होता है।

इंटरनेट कनेक्शन के लिए हम अपने चारों ओर जो केबल्स और तमाम तरह बॉक्स का जाल देखते हैं, वह पूरी दुनिया को कनेक्ट करने का महज एक छोटा सा हिस्सा है। इंटरनेट कनेक्शन, स्पीड और डेटा ट्रांसफर का असली जाल तो समुद्र में हजारों मीटर नीचे बिछा हुआ है। यह जाल पूरी दुनिया को एक-दूसरे से कनेक्ट करता है। केबल के जाल की इस तस्वीर से आप समझ सकते हैं कि दुनिया समुद्र के नीचे बिछे केबल्स के जरिए कैसे वर्चुअल कनेक्शन स्थापित करती है।

समुद्र के नीचे इन केबल्स का एक बड़ा जाल बिछा है। 99% दुनिया में कम्युनिकेशन और डेटा ट्रांसफर समुद्र के नीचे बिछी कम्युनिकेशन केबल्स के जरिए ही होता है। इन केबल्स को सबमरीन कम्युनिकेशन केबल कहते हैं। अभी समुद्र के नीचे करीब 426 सबमरीन केबल्स हैं, जिनकी कुल लंबाई लगभग 13 लाख किलोमीटर है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक जैसी बड़ी इंटरनेट कंपनियां इन्हें बिछाती हैं। तमाम टेलिकॉम प्रोवाइडर्स भी इसकी फंडिंग के हिस्सेदार होते हैं।

केबल हजारों किलोमीटर लंबे होते हैं और एवरेस्ट (8,848 मीटर) जितनी गहराई से भी अधिक नीचे बिछे होते हैं। इन्हें एक खास नाव- ‘केबल लेयर्स’ के जरिए समुद्र की सतह पर बिछाया जाता है। 100-200 किमी. केबल ही आमतौर पर एक दिन में बिछाए जाते हैं। इनकी चौड़ाई 17 मिलीमीटर के आसपास होती है। सैटलाइट सिस्टम की तुलना सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल डाटा ट्रांसफर के लिए काफी सस्ते पड़ते हैं। इनका नेटवर्क भी ज्यादा फास्ट होता है।

समुद्र के नीचे बिछी इन केबल्स को सबसे ज्यादा खतरा तो प्राकृतिक आपदाओं से होता है। वहीं इन केबल्स को समुद्री जीवों से भी खतरा होता है, लेकिन इसके लिए तमाम उपाय भी किए जाते हैं। हाई प्रेशर वाटर जेट तकनीक के जरिए इन केबल को समुद्र की सतह के अंदर गाड़ दिया जाता है, ताकि कोई समुद्री जीव या सबमरीन इन्हें नुकसान न पहुंचा सके। कई बार समुद्री शार्कों ने इन केबल्स को चबाने की कोशिश की है। इसके बाद केबल्स के ऊपर शार्क-प्रूफ वायर रैपर लगाना शुरू किया गया। इन केबल्स को समुद्र के अंदर गहराइयों में अत्याधिक गतिविधियां करने से भी नुकसान पहुंच सकता है।

2016 में तमिलनाडु में आए साइक्लोन वरदा ने समुद्र के नीचे बिछे इंटरनेट केबल्स को नुकसान पहुंचाया था, जिससे देश के कुछ हिस्सों में एयरटेल नेटवर्क की इंटरनेट स्पीड स्लो हो गई थी। कंपनी ने ग्राहकों को इस बारे में सूचना भेजी थी। 2013 में कुछ शरारती तैराकों ने यूरोप और अमेरिका से इजिप्ट पहुंचने वाले चार केबल्स को काट दिया था। इससे पूरे इजिप्ट की इंटरनेट स्पीड 60 फीसदी धीमी हो गई थी। केबल कहां से कटा इसका पता लगाने के लिए रोबोट्स को भेजा जाता है। एक केबल का जीवनकाल करीब 25 साल होता है। कुछ वक्त की परेशानी के बाद केबल को दुरुस्त कर लिया जाता है।

दुनिया भर में 500 से ज्यादा सक्रिय ज्वालामुखी हैं। इनमें से आधे से ज्यादा रिंग ऑफ फायर का हिस्सा हैं। यह प्रशांत महासागर के चारों ओर ज्वालामुखियों के हार जैसा है। इसलिए इसे रिंग ऑफ फायर कहते हैं।