5G सेवाओं से क्या है दिक्कत? (What is the problem with 5G Services?) : डेली करेंट अफेयर्स

वेरिजोन और एटीएंडटी अमेरिका की टेलीकॉम कंपनियां हैं। बीते 19 जनवरी को इन कंपनियों ने अपने 5G सेवाओं को लांच किया। लेकिन एयर इंडिया समेत कुछ विमान कंपनियों ने 5G सेवाओं की लॉन्चिंग को देखते हुए अपनी वहां की उड़ानों में कटौती कर दी। इन विमान कंपनियों का कहना है कि 5G सेवाओं के चलते उड़ान प्रभावित हो सकता है।

TSDSI की 5G से संबंधित प्रौद्योगिकी का ...

समय के साथ टेलीकॉम या वायरलेस इंडस्ट्री अपने इंफ्रास्ट्र्क्चर में सुधार करती रहती है। पहले 2G था … फिर 3G आया … उसके बाद 4G और अब बात चल रही है 5G की। यह एक तरह से नेटवर्क को अपग्रेड करने की प्रक्रिया होती है जिसमें सबसे बड़ा अंतर स्पीड का होता है। 4G में अधिकतम स्पीड 100 MBPS हो सकती है, जबकि 5G में यही स्पीड 20000 MBPS तक जा सकती है। स्पेक्ट्रम में जितनी ज्यादा फ्रीक्वेंसी होती है नेटवर्क सेवा उतनी ही तेज होती है। 5G सेवाओं में नेटवर्क की स्पीड के लिए तीन अलग-अलग आवृत्ति यानी फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल होता है - लो बैंडविड्थ, मिड बैंडविड्थ और हाई बैंडविड्थ। टेलिकॉम कंपनियां मिड बैंडविड्थ और हाई बैंडविड्थ वाली फ्रीक्वेंसी चाहती हैं, ताकि उनकी सेवाएं काफी तेज रहे। यही हाई फ्रीक्वेंसी ही हवाई जहाज के ऑपरेशन के लिए खतरा की आशंका बन रही है।

5G सेवाएं रेडियो सिग्नल पर आधारित होती हैं। अमेरिका में 5G के लिए C-बैंड वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह मिड-रेंज बैंडविड्थ होती है जिसकी फ्रीक्वेंसी 3.7-3.9 GHz के बीच है। वहीं विमान का ऑल्टीमीटर रेडियो सिग्नल भी लगभग इसी रेंज वाली फ्रीक्वेंसी (4.2-4.4 GHz) का इस्तेमाल करता है। ऑल्टीमीटर एक तरह का यंत्र होता है जो विमान के उड़ान से जुड़े कई महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराता है। इन्हीं आंकड़ों की मदद से विमान का उड़ान संचालित किया जाता है। यह बताता है कि विमान जमीन से कितनी ऊंचाई पर उड़ रहा है। साथ ही यह उसकी सेफ्टी और नेविगेशन सिस्टम के लिए भी आंकड़े उपलब्ध कराता है। यह आंकड़े विमानों के लिए वातावरण में बेहद ही कम दूरी पर हवाओं की स्पीड/या दिशा में अंतर के बारे में पूर्व चेतावनी देने के काम आते हैं। इसे विंड शियर कहते हैं। अब चूँकि 5G की फ्रीक्वेंसी और विमान के अल्टीमीटर की रेडियो फ्रीक्वेंसी लगभग एक ही रेंज में आते हैं इससे अल्टीमीटर द्वारा सही आंकड़े उपलब्ध कराने की प्रक्रिया बाधित होती है। इसके कारण जहाजों की सुरक्षा और उनके यात्रा मार्ग यानी नेविगेशन को खतरा पहुंचने की आशंका होती है। जिस तरह सड़कों पर गाड़ियां दाएं-बाएं होकर यातायात को नियंत्रित करती हैं, ठीक उसी तरह हवा में विमान अल्टीमीटर की मदद से ऊंचाई का अंदाजा लगाकर ऊपर-नीचे होकर एक दूसरे से टकराने से बच जाते हैं। ऑल्टीमीटर के प्रभावित होने से खराब मौसम, बादलों, या कोहरे के दौरान विमान केवल विजुअल डेटा पर निर्भर रहेंगे, इससे उनकी लैंडिंग और टेक आप पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इतना ही नहीं, प्लेन के रेडियो ऑल्टीमीटर के प्रभावित होने से विमान के ऑटोमेशन सिस्टम या पायलट के विशेषकर जमीन के करीब पहुंचने पर सटीक अंदाजा न लगा पाने से दुर्घटना भी हो सकती है।

मौजूदा मामले में कई उड़ानें रद्द होने के कारण एविएशन इंडस्ट्री को अरबों का नुकसान होने की आशंका है। यहां एक सवाल उठता है कि आखिर कई देशों में 5G सेवाएं पहले से चल रही हैं तो वहां पर उड़ानें प्रभावित क्यों नहीं हो रही हैं? अभी वर्तमान में 40 ऐसे देश हैं जहां पर 5G सेवाएं संचालित हो रही हैं और वहां उड़ानों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ रहा है। दरअसल इन देशों में 5G के लिए अमेरिका के मुकाबले कम फ्रीक्वेंसी वाली बैंड का आवंटन किया गया है और विमान की रेडियो फ्रीक्वेंसी इसकी अपेक्षा थोड़ी ज्यादा है। इस कारण इन देशों में विमानों का अल्टीमीटर प्रभावित नहीं होता है। इसके अलावा, इन देशों में इस तरह की समस्या से बचने के लिए एयरपोर्ट के आस-पास एक बफर जोन बना दिया गया है यानी यहां पर 5G सेवाएं संचालित नहीं की जाती हैं। साथ ही यहां एंटीना को थोड़ा नीचे की ओर झुका दिया जाता है, ताकि विमान के सिग्नल पर कोई नकारात्मक असर न पड़े। बात अगर भारत की करें तो यहां आगामी कुछ महीनों में दिल्ली, मुंबई समेत 13 बड़े शहरों में 5G का ट्रायल शुरू होने वाला है। माना जा रहा है कि अमेरिका में हुई मौजूदा दिक्कत से सीख लेते हुए भारत भी अपने यहां यूरोपीय देशों जैसे उपाय करेगा, ताकि यहां पर 5G के चलते उड़ान प्रभावित न हो।