विश्व जनसंख्या स्थिति रिपोर्ट 2022 (World Population Status Report 2022) : डेली करेंट अफेयर्स

बीते 30 मार्च को संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने एक ‘विश्व जनसंख्या स्थिति 2022’ नामक रिपोर्ट जारी किया। इस रिपोर्ट में फॅमिली प्लानिंग और सम्बंधित तथ्यों के बारे कई महत्वपूर्ण आंकड़े बताये गए हैं। UNFPA के बारे में आपको बताएं तो ये संयुक्त राष्ट्र की यौन व प्रजनन स्वास्थ्य एजेंसी है। इसके अलावा, अभी हाल ही में केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया ने संसद में बताया कि देश में जबरन जनसंख्या न‍ियंत्रण कानून नहीं लाया जाएगा। भारत की जनता इसे खुद से ही न‍ियंत्रित कर रही है और इसके ल‍िए जागरूकता अभ‍ियान भी चलाया जा रहा है।

जीव विज्ञान में, विशेष प्रजाति के अंत: जीव प्रजनन के संग्रह को जनसंख्या कहते हैं। समाजशास्त्र में जनसंख्या को 'मनुष्यों के संग्रह' के तौर पर परिभाषित किया गया है। किसी क्षेत्र में, समय की किसी निश्चित अवधि के दौरान वहां बसे हुए लोगों की संख्या में बदलाव होता रहता है। इसे ही जनसंख्या वृद्धि यानी जनसंख्या परिवर्तन कहा जाता है, ये धनात्मक भी हो सकता है और ऋणात्मक भी।

जनगणना 2011 के आंकड़ों के मुताबिक़ देश की जनसंख्या बढ़कर 121.07 करोड़ से भी ज़्यादा हो चुकी है। ये आंकड़े 2011 से सम्बंधित हैं, जबकि ये 2022 चल रहा है, तो जाहिर है कि अब परिदृश्य काफी बदल चुका होगा। इसके अलावा, जनसंख्या वृद्धि दर संबंधी आंकड़ों पर नजर रखने वाली वेबसाइट वर्ल्डोमीटर के अनुसार 2021 में भारत की जनसंख्या लगभग 139 करोड़ हो चुकी थी। वहीं UNFPA की ‘विश्व जनसंख्या स्थिति 2022’ रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल जितने गर्भ ठहरते हैं, उनमें से लगभग आधे यानि क़रीब 12 करोड़ 10 लाख गर्भ अनचाहे होते हैं। अनचाहे गर्भधारण के मामलों में से लगभग 60% महिलाओं को गर्भपात करवाना पड़ता है। दुखद बात ये है कि गर्भपात के इन कुल मामलों में लगभग 45 प्रतिशत असुरक्षित होते हैं। जच्चा महिलाओं की 5 से 13 प्रतिशत मौतों के लिये ऐसे मामले ही ज़िम्मेदार होते हैं। ध्यान दीजिएगा कि ये स्थिति SDG लक्ष्यों को हासिल करने में एक बड़ी रुकावट है। रिपोर्ट में लैंगिक विषमता और अवरुद्ध विकास के कारण, अनचाहे गर्भ मामलों में ज़्यादा बढ़ोत्तरी होती है। उदाहरण के लिये, दुनिया भर में गर्भ से बचने वाली लगभग 25 करोड़ 70 लाख महिलाएँ, गर्भ निरोध के लिये सुरक्षित व आधुनिक तरीक़े नहीं अपनाती हैं। 25% महिलाएँ ऐसी हैं जिनके गर्भधारण पर उनका खुद का वश नहीं है और वे पुरुषों के अधीन हैं। युद्ध एवं संघर्ष की स्थितियों में अनचाहे गर्भधारण में और वृद्धि हो जाती है।

इन आंकड़ों से साफ है कि भारत में जनसँख्या अभी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, परिवार नियोजन की कमी, बाल विवाह और अशिक्षा जैसे कारकों को भारत में जनसंख्या वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है। इसके अलावा तमाम धार्मिक कारण, रूढ़िवादिता, गरीबी और अवैध प्रवासन के चलते भी जनसंख्या वृद्धि हुई है। जनसंख्या विस्फोट के कारण बेरोजगारी, खाद्य समस्या, कुपोषण, प्रति व्यक्ति निम्न आय और ग़रीबी जैसी दिक्कतें उभरकर सामने आयीं हैं। साथ ही बचत और पूंजी निर्माण में कमी, जनोपयोगी सेवाओं पर अधिक खर्च, अपराध, पलायन और शहरी समस्याओं में वृद्धि जैसी दूसरी समस्याएं भी पैदा हुई हैं।

रोचक तथ्य ये है कि भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जिसने सबसे पहले 1952 में परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाया था। साल 1976 में देश की पहली जनसंख्या नीति की घोषणा की गई, बाद में 1981 में इस जनसंख्या नीति में कुछ संशोधन भी किए गए। इसके बाद फरवरी 2000 में सरकार ने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000 की घोषणा की। इस जनसंख्या नीति का प्रमुख मक़सद प्रजनन तथा शिशु स्वास्थ्य की देखभाल के लिए बेहतर सेवातंत्र की स्थापना तथा गर्भ निरोधकों और स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढांचे की ज़रूरतें पूरी करना है। इसका दीर्घकालीन लक्ष्य जनसंख्या में साल 2045 तक स्थायित्व प्राप्त करना है।

मई 2000 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का गठन किया गया। आयोग राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा करने और इससे जुड़े कार्यक्रमों की योजना बनाने का काम करता है। इस आयोग के अंतर्गत, एक राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरता कोष की भी स्थापना की गई। बाद में इस कोष को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के अंतर्गत स्थानांतरित कर दिया गया।

ग़ौरतलब है कि आबादी पर काबू पाने के लिहाज़ से देश में साल 1996 से काहिरा मॉडल लागू है जिसके तहत आबादी को घटाने के लिए आम जनता पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला जाता है, बल्कि शिक्षा के ज़रिए उनमें छोटे परिवार के प्रति एहसास जगाया जाता है।

जनसंख्या वृद्धि से निपटने के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम, गर्भ निरोधक दवाइयों तक बेहतर पहुँच और परिवार नियोजन सेवाओं के लिए कुशल कर्मियों की बढ़ोत्तरी जैसे क़दम सरकार द्वारा उठाये जा रहे हैं। जनसंख्या नीतियों और तमाम दूसरे उपायों के कारण प्रजनन दर में कमी तो आयी है लेकिन ये अभी भी दूसरे देशों के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा है।

ध्यान दीजियेगा कि अगर जनसंख्या वृद्धि को एक अलग नजरिए से देखा जाए तो ये भारत जैसे देशों के लिए बहुत ही कारगर भी साबित हो सकती है। जनसांख्यिकीय लाभांश, मानव संसाधन में बढ़ोत्तरी, शक्तिशाली सेना और एक बड़े बाज़ार को जनसंख्या वृद्धि के फायदे के रूप में देखा जाता है। इसका ये मतलब नहीं कि जनसंख्या की बेतहाशा वृद्धि को सही ठहराया जाय, लेकिन जो जनसंख्या है उसका प्रोडक्टिव इंगेजमेंट होना ज़रूरी होता है। इसमें सबसे अहम् भूमिका सरकार की होती है, लेकिन आम जनता के कन्धों पर भी ये जिम्मेदारी होती है।