चुनावी बॉण्ड की पारदर्शिता एवं विवाद - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चुनावी बॉण्ड की पारदर्शिता एवं विवाद - यूपीएससी, आईएएस, सिविल सेवा और राज्य पीसीएस  परीक्षाओं के लिए समसामयिकी


चर्चा का कारण

हाल ही में चुनावी बॉण्ड (Electoral Bond) को औपचारिक भ्रष्टाचार का स्रोत बताते हुए कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने संसद में हंगामा किया। इसके फलस्वरूप चुनावी चंदे की पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है।

परिचय

वर्ष 2017 के बजट से पहले यह नियम था कि यदि किसी राजनीतिक पार्टी को 20 हजार रुपये से कम का चंदा मिलता है तो उसे चंदे का स्रोत बताने की जरूरत नहीं है। इसी का फायदा उठाकर अधिकतर राजनीतिक दल कहते थे कि उन्हें जो भी चंदा मिला है वह 20 हजार रुपये प्रति व्यक्ति से कम है इसलिए उन्हें इसका स्रोत बताने की जरूरत नहीं है। इस व्यवस्था के चलते देश में काला धन पैदा होता था और चुनाव में इस धन का इस्तेमालकर चुनाव जीत लिया जाता था। कुछ राजनीतिक दलों ने तो यह दिखाया कि उन्हें 80-90 प्रतिशत चंदा 20 हजार रुपये से कम राशि के फुटकर दान के जरिये ही मिला था। चुनाव आयोग की सिफारिश के आधार पर सरकार ने गुमनाम नकद दान की सीमा को घटाकर 2000 रुपये कर दिया अर्थात् 2000 रुपये से अधिक का चंदा लेने पर राजनीतिक पार्टी को यह बताना होगा कि उसे किस स्रोत से चंदा मिला है।

चुनावी बॉण्ड की प्रक्रिया

केंद्र सरकार ने देश के राजनीतिक दलों के चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में चुनावी बॉण्ड शुरू करने का ऐलान किया था। चुनावी बॉण्ड से मतलब एक ऐसे बॉण्ड से होता है, जिसके ऊपर एक करेंसी नोट की तरह उसकी कीमत लिखी होती है। इस बॉण्ड का प्रयोग व्यक्तियों, संस्थाओं अथवा संगठनों द्वारा राजनीतिक दलों को रकम दान करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। नकद चंदे के रूप में दो हजार से बड़ी रकम नहीं ली जा सकती है। चुनावी बॉण्ड एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख तथा एक करोड़ रुपये के मूल्य के होते हैं, जो बॉण्ड खरीदे जाने के केवल 15 दिनों तक ही मान्य रहते हैं। इसका आशय है कि इन्हें खरीदने वालों को 15 दिनों के अंदर ही राजनीतिक दल को देना पड़ता है और राजनीतिक दलों को भी इन्हीं 15 दिनों के अंदर इसे कैश कराना होता है। इसमें दानदाता का नाम नहीं होता है जिसको लेकर सरकार की दलील है कि चूंकि बॉण्ड पर दानदाता का नाम नहीं होता है, नतीजतन पार्टी को भी दानदाता का नाम नहीं पता चल पाता है। सिर्फ बैंक जानता है कि किसने किसको यह चंदा दिया है। इस प्रकार इसका मूल मंतव्य है कि पार्टी अपनी बैलेंसशीट में चंदे की रकम को बिना दानदाता के नाम के जाहिर कर सके। सरकार की ओर से चुनावी बॉण्ड जारी करने और उसे भुनाने के लिए भारतीय स्टेट बैंक को अधिकृत किया गया है, जो अपनी शाखाओं के माध्यम से यह काम करता है। स्मरणीय हो कि चुनावी बॉण्ड को लाने के लिए सरकार ने फाइनेंस एक्ट-2017 के जरिये रिजर्व बैंक एक्ट-1937, जनप्रतिनिधित्व कानून -1951, आयकर एक्ट-1961 और कंपनी एक्ट में कई संशोधन किए थे।

सरकार ने इस बॉण्ड योजना को दो जनवरी, 2018 को अधिसूचित किया जिसके मुताबिक कोई भी भारतीय नागरिक या भारत में स्थापित संस्था चुनावी बॉण्ड खरीद सकती है। चुनावी बॉण्ड खरीदने के लिए संबंधित व्यक्ति या संस्था के खाते का केवाइसी वेरिफाइड होना आवश्यक होता है। जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत राजनीतिक पार्टियां तथा पिछले आम चुनाव या विधानसभा चुनाव में जनता का कम से कम एक फीसद वोट हासिल करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ ही चुनावी बॉण्ड के जरिये पैसे ले सकती हैं। चुनावी बॉण्ड पर बैंक द्वारा कोई ब्याज नहीं दिया जाता है।

चुनावी बॉण्ड और चुनाव आयोग

हाल ही में आरटीआई से यह खुलासा हुआ है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने वित्त मंत्रलय को दो मौकों पर राज्य विधानसभा चुनावों के लिए समय से पहले चुनावी बॉण्ड की बिक्री को मंजूरी देने के लिए विशेष विंडो खोलने को कहा, जबकि नियम के मुताबिक बॉण्ड की बिक्री के लिए विशिष्ट अवधि निर्धारित है। इससे पूर्व भी सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने इस बॉण्ड का विरोध करते हुए कहा था कि हम चुनावी बॉण्ड के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि दानदाताओं के नाम गोपनीय रखने के खिलाफ हैं। चुनाव आयोग का यह भी कहना है कि गोपनीयता के कारण रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट की धारा-29 बी के तहत कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं, इसकी जांच में चुनाव आयोग को कठिनाइयाँ आ रही हैं।

गौरतलब है कि संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनाव संबंधी शक्तियां प्रदान करता है। ऐसे में चुनाव आयोग के चुनावी बॉण्ड के प्रति विरोध को सुप्रीम कोर्ट ने पर्याप्त महत्व दिया।

उल्लेखनीय है कि चुनाव सुधार के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था एडीआर ने भी उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें राजनीतिक दलों को मिले चुनावी बॉण्ड की रकम को सार्वजनिक करने को कहा गया था। केंद्र सरकार ने इसके लिए आम चुनाव खत्म होने तक प्रतीक्षा करने को कहा, मगर उसकी इस दलील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि वह मामले को विस्तार से देखेगा। चुनाव सुधार की दिशा में इसे बेहतरीन कदम माना गया और उम्मीद जगी कि जल्द ही देश में राजनीतिक दलों के चंदे से संबंधित एक ऐसा पारदर्शी ढांचा बन सकेगा, जहाँ राजनीतिक दलों के ‘अज्ञात स्रोत’ वाले चंदे का मॉडल समाप्त हो जायेगा।

सरकारी प्रयास

भारतीय राजनीति में चुनावी चंदे का मामला हमेशा से ही विवादों के घेरे में रहा है नतीजतन चुनावी चंदा देने के तरीकों में लगातार बदलाव होते रहे हैं, चुनावी बॉण्ड योजना इसी कड़ी का एक हिस्सा भर है। इस संदर्भ में अब तक चुनावी चंदे में पारदर्शिता के लिए किए गए सरकारी प्रयासों को निम्नबिन्दुओं के अंतर्गत देख सकते हैं-

  • जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 29-बी में चुनावी फंडिंग के तरीकों का जिक्र किया गया है। परन्तु 1968 में कॉर्पोरटे फंडिंग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  • 1974 में कंवर लाल गुप्ता बनाम अमरनाथ चावला विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि उम्मीदवारों के चुनावी खर्च को पार्टी के चुनावी खर्च में शामिल किया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि इसके अगले ही वर्ष संसद ने कोर्ट के आदेश के खिलाफ कानून बनाया। 1985 में कंपनी अधिनियम में संशोधन कर कॉर्पोरटे फंडिंग को लाया गया जिसके मुताबिक कंपनियाँ पिछले तीन वर्षों में हुए अपने औसत शुद्ध लाभ का पाँच फीसद तक दान कर सकेंगी।
  • चुनावी फंडिंग में और अधिक परिवर्तन तब किया गया, जब दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट, 1990 और इंद्रजीत गुप्ता समिति की रिपोर्ट, 1998 ने चुनावों में आंशिक राज्य वित्तपोषण की सिफारिश की बात कही।
  • गौरतलब है कि 2003 में सरकार द्वारा व्यक्तिगत और कॉर्पोरटे फंडिंग को पूर्ण रूप से कर-मुक्त कर दिया गया। लेकिन इसकी सीमा तय कर दी गई जिसके अनुसार 20 हजार रुपए से कम की नकद राशि चंदे के रूप में दी जा सकती है। इसमें दानकर्त्ता का पहचान बताना भी जरूरी नहीं था।
  • इस व्यवस्था के पश्चात् कुछ ही वर्षों में चुनावी फंडिंग के कई संदेहास्पद मामले सामने आये जिसके बाद वर्ष 2017 में केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग की उस सिफारिश को मान लिया जिसमें 20 हजार रुपए की सीमा को घटाकर 2 हजार रुपए करने की बात कही गई थी।

चुनौतियाँ

राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने के तमाम दावों के बीच चुनावी बॉण्ड पर भी अपारदर्शी होने का आरोप लगने लगा। इसके समक्ष उपस्थित चुनौतियों का जिक्र निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत किया जा सकता है-

  • राजनीतिक दलों की फंडिंग में अज्ञात स्रोतों से आने वाले आय की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। पिछले 15 वर्षों में अज्ञात स्रोतों से मिलने वाले राजनीतिक दलों के चंदे की मात्रा काफी ज्यादा रही, लेकिन चुनावी बॉण्ड से भी इसमें ज्यादा बदलाव नहीं आया।
  • इस योजना के कई स्याह पक्ष हैं जैसे पार्टियों के व्यय की कोई तय सीमा नहीं रखी गई है साथ ही चुनाव आयोग इसकी निगरानी भी नहीं कर सकता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना मुश्किल होता है कि जो राशि आ रही है वह काला धन है या फिर सफेद, क्योंकि दाता गोपनीय होता है। चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि उत्तफ़ योजना दाता की पूरी गुमनामी की सुविधा प्रदान करता है। दरअसल यह योजना न तो बॉण्ड के खरीददार और न ही दान प्राप्त करने वाली राजनीतिक पार्टी की पहचान का खुलासा करने को बाध्य है।
  • कुछ लोगों का मानना है कि बॉण्ड खरीदने वाले की जानकारी गुप्त रखे जाने से यह प्रयास अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पायेगा और राजनीति में भ्रष्टाचार बना रहेगा।
  • इसके अतिरिक्त इस योजना में किसी दानकर्त्ता कंपनी को दान करने से कम से कम तीन साल पहले अस्तित्व में होने की पूर्व शर्त को भी हटा दिया गया। यह शर्त शेल कंपनियों के माध्यम से काले धन को राजनीति में खपाने से रोकती थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनावी बॉण्ड के मामले पर केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि जिस तरह से चुनावी बॉण्डस की बिक्री को लेकर बैंकों को कोई जानकारी नहीं दी जा रही है, इससे लगता है कि यह काले धन को सफेद करने का एक तरीका भर है।
  • विदित हो कि कम्युनिस्ट पार्टी और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएँ दायर कर चुनावी बॉण्ड योजना की वैधता को चुनौती दी है। याचिकाकर्त्ताओं ने कहा है कि यह योजना अपारदर्शी फंडिंग सिस्टम है जिस पर कोई निगरानी नहीं है। इसके अलावा बॉण्ड में बरती गई गोपनीयता से कॉर्पोरटे हाउसों को फायदा होगा, क्योंकि इसमें बॉण्ड प्राप्त करने वाले राजनैतिक दलों के नाम का खुलासा नहीं करने का प्रावधान है। ऐसे में राज्य की सरकारी नीतियों में कॉर्पोरटे के निजी हित को प्राथमिकता मिल जायेगा और आम जनता का हित पीछे रह जायेगा।
  • चुनावी सुधारों पर विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट में भी कहा गया है कि चुनावी फंडिंग में अपारदर्शिता बड़े दानदाताओं द्वारा सरकार को ‘कैप्चर’ करने जैसा है। राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता जितनी कम होगी, कॉर्पोरटे घरानों के लिये उतना ही आसान होगा कि वे जो बात चाहें सरकार से मनवा सकें।
  • गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ के अनुसार, राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का 69 फीसद हिस्सा अज्ञात स्रोतों से प्राप्त होता है। जाहिर है यह आँकड़ा विधि आयोग की चिंता को और बढ़ाने जैसा है।
  • आरबीआई ने 30 जनवरी, 2017 को लिखे एक पत्र में कहा था कि यह योजना पारदर्शी नहीं है, साथ ही यह मनी लांड्रिंग कानून को कमजोर करती है। इससे केंद्रीय बैंकिंग कानून के मूलभूत सिद्धांतों पर खतरा उत्पन्न हो जाएगा। चुनाव आयोग ने दानदाताओं के नामों को उजागर न करने और घाटे में चल रही कंपनियों जो केवल शेल कंपनियों के स्थापित होने की संभावनाएं खोलती हैं, को बॉण्ड खरीदने की अनुमति देने को लेकर चिंता जताई थी।
  • कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि चूंकि इन बॉण्ड को बेचने वाला भारतीय स्टेट बैंक खरीददार की पहचान जानता है, इसलिए सत्ता में सरकार आसानी से यह पता लगा सकती है कि बॉण्ड किसने और किसके लिए खरीदा है। इससे सरकार बॉण्ड धारक को परेशान कर सकती है।

आगे की राह

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव को साफ-सुथरा और पारदर्शी बनाना हमेशा ही एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा है। यही कारण है कि चुनाव आयोग के साथ-साथ विधि आयोग भी समय-समय पर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन की सिफारिश करता रहा है। बावजूद इसके पारदर्शिता के नाम पर सरकार का हर प्रयास अधूरा ही साबित हुआ है। विदित हो कि पूर्व में मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टी.एस. कृष्णमूर्ति, एस.वाई. कुरैशी और ओ.पी. रावत ने भी चुनावी बॉण्ड को लोकतंत्र के लिये अहितकारी माना है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि इन खामियों को दूर करते हुए एक नई बॉण्ड प्रणाली को लाया जाए। इस संदर्भ में यहाँ कुछ सुझावों पर ध्यान दिया जा सकता है-

  • राष्ट्रीय चुनावी कोष बनाया जाए जिसमें सभी दानदाता योगदान दे सकें।
  • कोष में जमा राशि को मिलने वाले वोटों के अनुपात में राजनीतिक दलों के बीच आवंटित किया जाना चाहिए।
  • इससे न केवल दानदाताओं की पहचान सुरक्षित होगी बल्कि राजनीतिक चंदे से काला धन भी खत्म हो जायेगा।
  • सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वह आधी-अधूरी पारदर्शिता के बजाय पूर्ण पारदर्शिता वाली किसी प्रक्रिया पर कार्य करे ताकि चुनावी चंदे को भ्रष्टाचार और कालाधन से मुक्त किया जा सके।
  • चुनावी बॉण्ड में सुधार करते हुए गोपनीयता के कायदे-कानून में सुधार करना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि कौन सी पार्टी किस जगह से पैसा जुटाती है और उसको दान देने वाले लोग कौन हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि चुनावी बॉण्ड संबंधित जानकारी न केवल चुनाव आयोग तक सीमित रहे, अपितु सामान्य मतदाताओं को भी पता हो।

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-2

  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएं।
  • शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस- अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएं, सीमाएं और संभावनाएं, नागरिक घोषणा-पत्र, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय।


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